Posts

Showing posts from November, 2022

ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने पर सवाल खड़े करनेवाले आईना भी देखे लें।

Image
#ईसा_के_पुनर्जीवित_होने_पर_सवाल_करनेवाले_आईना_भी_देखें●●●        कृष्ण ने अपने गुरु ऋषि सांदीपनी के पुत्र को मृत्यु के देवता यम के लोक से वापस ले आए थे; यह जानते हुए भी कि गुरु का पुत्र अपने निज कर्मों की वजह से ले जाया गया था, लेकिन अपनी शक्ति और यम पर आधिपत्य की वजह से उन्होंने उसे पुनर्जीवित किया।        यह सृष्टि नियम के विरुद्ध है?? वेद में लिखा है  परमात्मा  जो इंसान मरने वाला हो आयु से परे चला गया हो उसको जिंदा करता है और 100 साल तक जीवन दान देता है। पूर्ण परमात्मा में कोई रूल वुल नहीं चलता। जो। मृत्यु ना टाल सके फिर कैसा ईश्वर!!! 🍯यदि॑ । क्षि॒तऽआ॑युः । यदि॑ । वा॒ । परा॑ऽइतः । यदि॑ । मृ॒त्योः । अ॒न्ति॒कम् । निऽइ॑तः । ए॒व । तम् । आ । ह॒रा॒मि॒ । निःऽऋ॑तेः । उ॒पऽस्था॑त् । अस्पा॑र्षम् । ए॒न॒म् । श॒तऽशा॑रदाय ॥ १०.१६१.२ ऋग्वेद मण्डल:10सूक्त:161मन्त्र:2  पदार्थान्वयभाषाः - (यदि क्षितायुः) यदि रोगाक्रान्त क्षीण आयु हो गया (यदि वा परेतः) यदि वर्त्तमान अवस्था से भी परे चला गया है, अधिक रोगी हो गया है *(अन्तिकं नीतः-एव)     👉यदि मृत्यु के समीप रोग ने पहुँचा दिया-मरणासन्न कर दिया *(तं निर...

वैदिक कसाई...

Image
पहले गोमेध यज्ञ में गायों की बलि देने वाले ब्राम्हण को शर्मा  (कसाई) कहते थे शर्मा शर्मन से बना है जिसका अर्थ काटना होता है। इन्हे ही शर्मा कहा जाता है। पहले गोमेध यज्ञ में गायों की बलि देने वाले ब्राम्हण को शर्मा  (कसाई) कहते थे शर्मा शर्मन से बना है जिसका अर्थ काटना होता है। इन्हे ही शर्मा कहा जाता है।

वेदों के प्रमुख देवता इन्द्र दुराचारी थे।।

Image
लोगों की ये आम धारणा है कि इंद्र गौतम ऋषि का वेश बना कर आये इसी कारण अहिल्या उन्हें पहचान नहीं पायी। हालाँकि ये बिलकुल गलत है। अहिल्या का जन्म स्वयं ब्रह्मदेव से हुआ था और उन्हें छला नहीं जा सकता था। वाल्मीकि रामायण में ये साफ लिखा है कि जब इंद्र गौतम ऋषि के वेश में आये और अहिल्या से प्रणय याचना की तब अहिल्या ने ये जान लिया था कि ये उनके पति नहीं हैं। किन्तु ये जान कर कि स्वयं देवराज इंद्र उनसे प्रणय याचना कर रहे हैं, अहिल्या ने सब कुछ जानते बूझते कौतुहल में उनकी बात मान ली। यह बात महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को बताते हैं। मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन। मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥ स्रोत: बालकाण्ड, सर्ग 48, श्लोक 19 अर्थात:  ‘रघुनन्दन ! महर्षि गौतम का वेष धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारी ने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहल वश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। यहाँ तक कि इंद्र से समागम के पश्चात अहिल्या इंद्र को धन्यवाद देते हुए कहती हैं कि अब आप शीघ्रता से यहाँ से चले जाइये और महर्षि गौतम के क्रोध से...