#आर्य समाजियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले सवाल..
🤔यहोवा ने भले बुरे ज्ञान के फल को आदम से झूठ बोलकर दूर क्यों रखा?
🤔ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ है,तो धूर्त शैतान को क्यों बनाया?
🤔वह पूर्व जन्म नहीं मानता तो बिना अपराध के शैतान को अपराधी क्यों ठहराया?
🤔शैतान को ईश्वर ने ही बनाया तो शैतानी कामों का भागीदार ईश्वर भी है.
समाजी बंधुओं बाईबल समझने के लिए संपूर्ण बाईबल का अध्ययन आवश्यक है. खंडित आयतों से नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता. जिस तरह पके आम का स्वाद जानने के लिए आम के बौराने, फलने और पकने का इंतजार करना होगा. आम के बौर खा लेने से पके आम के स्वाद का अनुमान लगा पाना मुश्किल है. दयानंद जी ने यही हड़बड़ी की है. उन्होंने आम की पत्तियां चबाकर पके आम का स्वाद अनुमान और कयास बताया है.
ईश्वर ने शैतान कभी नहीं बनाया ऐसे में यह कहना कि शैतान और उसके शैतानी कार्यों का भागीदार ईश्वर भी है. यह सर्वथा अनुचित है, गलत है. पूर्व जन्म मिथ्या है, कयास है अतः इस पर बातें करना ही समय जाया करना है.बाईबल के अनुसार फरीश्ते ही अवज्ञ से शैतान कहलाये.अवज्ञ तात्कालिक था.यह अगले पिछले जन्मों का अपराध बिल्कुल नहीं था...
परमेश्वर ने अदन की वाटिका में भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष को आदम और हव्वा को उसकी आज्ञा पालन करने या अवज्ञा करने के निर्णय को लेने के लिए रखा था। आदम और हव्वा जो कुछ चाहते थे वे उसे करने के लिए, केवल उस भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष में से खाने को छोड़कर स्वतंत्र थे। उत्पत्ति 2:16-17, "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, 'तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले और बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।'" यदि परमेश्वर ने आदम और हव्वा को निर्णय लेने की स्वतंत्रा नहीं दी होती, तो वे आवश्यक रूप से रोबोट ही होते, केवल वही करते जो कुछ उनमें प्रोग्राम करके लगा दिया गया होता। परमेश्वर ने आदम और हव्वा को "स्वतंत्र" प्राणियों के रूप में सृजा था, जो निर्णय लेने की योग्यता रखते थे, भले और बुरे के बीच में चुनाव करने के योग्य थे। आदम और हव्वा को सच्चाई में स्वतंत्र होने के लिए, उनको चुनाव करना जरूरी था।
वृक्ष या उस वृक्ष के फल में आवश्यक रूप से कुछ भी बुरा नही था। ऐसा कुछ भी नहीं था कि फल में या स्वंय फल ने आदम और हव्वा को कोई अतिरिक्त ज्ञान दिया होगा। अर्थात्, भौतिक फल में हो सकता है कि कुछ विटामिन सी और कुछ लाभदायिक रेशा रहा होगा, परन्तु यह किसी भी तरह से आत्मिक पोषक के रूप में नहीं रहा होगा। परन्तु, अवज्ञा का कार्य आत्मिक रूप से मिटा देने का था। पाप ने आदम और हव्वा की आँखों को बुराई के लिए खोल दिया। क्योंकि पहली बार, वे जान गए कि बुराई, शर्म का अहसास था और वे स्वयं को परमेश्वर से छिपाना चाहते थे। परमेश्वर के प्रति उनकी अवज्ञा के पाप ने उनके जीवन और संसार में भ्रष्टता को लाया। फल को खाना, परमेश्वर के विरूद्ध अवज्ञा का कार्य था, जिसने आदम और हव्वा को बुराई का ज्ञान – और उनके नंगेपन का ज्ञान दे दिया (उत्पत्ति 3:6-7)।
परमेश्वर नहीं चाहता था आदम और हव्वा पाप करें। परमेश्वर समय से पहले ही जानता था पाप का क्या परिणाम होगा। परमेश्वर जानता था कि आदम और हव्वा पाप करेंगे और परिणामस्वरूप उस संसार में बुराई, दुखों और मृत्यु को ले आएगें। फिर, क्यों, परमेश्वर ने शैतान को आदम और हव्वा को उकसाने की अनुमति दी? परमेश्वर ने शैतान को आदम और हव्वा को परीक्षा में डालने की अनुमति दी ताकि वे सही गलत का निर्णय स्वविवेक से कर सकें आदम और हव्वा ने, अपनी स्वतंत्र इच्छा में, परमेश्वर की अवज्ञा करना चुना और मना किए हुए फल को खा लिया। परिणाम – बुराई, पाप, दुख, बिमारी और मृत्यु तब से चारों और फैल गई.
तेरहवें समुल्लास में समीक्षक ने कहा फल खाने का परिणाम सुखकारक था!!!कैसे??
मृत्यु, तकलीफें, बीमारी, प्रसव पीड़ा आदि समीक्षक को सुखकर कैसे लगे!!?
🤔आजकल कोई फल ज्ञान कारक और मृत्यु निवारक देखने में नहीं आता. क्या उसका बीज ईश्वर ने नष्ट कर दिया??
😊आजकल कोई जीवन बूटी,सोम बूटी, वृषभ बूटी भी देखने में नहीं आता....??
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