दयानन्द और अंतिम सत्य..
#दयानंद_और_अंतिम_सत्य●●● मूलशंकर तिवारी(दयानंद सरस्वती)इस भ्रांति में जीते रहे कि वह हिंदुत्व का भला कर रहे हैं, दरअसल उन्हें खुद हिदुत्व की पूरी समझ नहीं थी. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि वे हिंदुत्व को केवल सतही, सरसरी तौर पर ही देखा था. उन्हें हिंदुत्व के पूजन विधान और कर्मकांड निरा दोषपूर्ण और पाखंड लगा.समाज सुधार की अपरिपक्व उत्तेजना में उन्हें भ्रम हो गया कि जिस बुनियाद पर हजारों वर्षों से हिंदुत्व टिका है,उसे अपने निजी कथित वैज्ञानिक विचारों से झटके भर में धता बताकर क्रांति लाने का प्रयोग किया. वे तमाम पुराने वेदभाष्यों और तमाम ग्रंथों को अवैज्ञानिक करारते हुए उनमें अपने निजी विचारों की मिलावट कर उसे ही अंतिम सत्य और आर्षग्रंथ बताकर हिंदुत्व के ऊंचे आदर्शों को बौना करने का काम किया..सनातनी हिंदुओं में फूट पैदा किया.हिंदुत्व को पाखंड और पौराणिक शास्त्रों को गप्प बताया, कुल्ला कर मूर्तियों में थूकने की बात कही. परिणाम स्वरूप हिंदू युवा धर्म च्युत होकर नास्तिक बनने लगे,ईश्वर के प्रति उनकी अनास्था बढ़ने लगी.आज भी हिंदू युवा अपने धर्म ग्रंथों के बारे में नहीं जानना चा...