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Showing posts from November, 2024

वैदिक गर्हित अनैतिक परंपराएँ●●●

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वैदिक काल से पाणिनि के काल तक वैदिकों के बीच अपने मित्र या अतिथि को स्वस्त्री संभोगार्थ  सौंपने की प्रथा प्रचलित थी.यह प्रथाएँ आज नीतिबाह्य और अनैतिक लगती है.परंतु इस परिवर्तन शील जगत में सभी वस्तुओं के गतिमान होने के कारण नीतियां भी परिवर्तन शील हैं.स्वयंभू स्थाई अथवा ब्रह्मा की लकीर नहीं.एक विशिष्ट कालावधि में एक विशिष्ट प्रथा नीतिपूर्ण मानी जाती है.और लोग भी उसी में ढल जाते हैं.जब समय बदलता है या समाज के अंदर संघर्ष होता है या किसी वाह्य प्रेरणा से परिवर्तन की क्रांति आती है तब पुरानी प्रथाएँ समाज में अव्यवहारिक हो जाती हैं. और विचत्र लगने लगती हैं.नियोग भी ऐसी ही पशुतुल्य कुप्रथा थी.    ऐसी प्रथाओं की गणना गर्हित प्रथाओं में होने लगती हैं.यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि गर्हित का अर्थ है मूलतः ऐसी चीज जो समाज को स्वीकार्य ना हो.इस प्रकार की गर्हित वर्तमान समाज को अमान्य और समाज को विलक्षण प्रतीत होने वाली स्वस्त्रीसमर्पण के अतिरिक्त अन्य कई प्रथाएँ वैदिक आर्य समाज में प्रचलित थी जिसप्रकार पृथ्वी के अन्य प्राचीन तथा अर्वाचीन न्यूनाधिक अन्यान्य समाजों में प्रचलित थीं.इनमें स...

हिंदू भाईयों को भी हूरें मिलती हैं..

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सिर्फ मुस्लिमों को ही जन्नत में 72 हूरें नहीं मिलती, स्वर्ग में भी भग्तों को अप्सराएं, देवकन्याएं, देवांगनाएं, सुंदर कन्याएं मिलती हैं। महाभारत व पुराणों में ऐसी सुंदरियों का जिक्र किया गया है। कुछ उदाहरण महाभारत गीता प्रेस गोरखपुर के अनुशासन पर्व से है :–  🔸जमीन, जायदाद, गांय, बैल, आदि ब्राह्मण को दान देने वाले तथा व्रत करने वाले को जहाज में बैठाकर स्वर्ग में ले जाया जाता है और फिर ऐसे भगत के मनोरंजन के लिए स्वर्ग में विभिन्न व्यवस्थाएं की जाती हैं -  1️⃣ सुंदर वस्त्र आभूषणों से विभूषित सैकड़ों अप्सराएं सेवा में हाजिर रहती हैं ( अध्याय 62 श्लोक 88 ) 2️⃣ मनोहर वेश और सुंदर नितंबों वाली ( पिछवाड़े वाली ) हजारों देवांगनाएं उससे रमण करवाती हैं ( रमण का अर्थ गूगल पर देखें ) अध्याय  79 श्लोक 25 ) 3️⃣ सुंदर अप्सराएं उसके साथ क्रीड़ा करती हैं। ( अध्याय 81 श्लोक 30 ) 4️⃣ 16 वर्ष की सी अवस्था वाली नूतन यौवन वाली तथा मनोहर रूप विलास से सुशोभित देवांगनाएं उसे प्राप्त होती हैं। ( अध्याय 107 श्लोक 38 ) 5️⃣ परम सुंदर मधुर भाषिणी दिव्य नारियां उसकी पूजा करती है तथा उससे काम भोग का सेवन...