वैदिक गर्हित अनैतिक परंपराएँ●●●

वैदिक काल से पाणिनि के काल तक वैदिकों के बीच अपने मित्र या अतिथि को स्वस्त्री संभोगार्थ  सौंपने की प्रथा प्रचलित थी.यह प्रथाएँ आज नीतिबाह्य और अनैतिक लगती है.परंतु इस परिवर्तन शील जगत में सभी वस्तुओं के गतिमान होने के कारण नीतियां भी परिवर्तन शील हैं.स्वयंभू स्थाई अथवा ब्रह्मा की लकीर नहीं.एक विशिष्ट कालावधि में एक विशिष्ट प्रथा नीतिपूर्ण मानी जाती है.और लोग भी उसी में ढल जाते हैं.जब समय बदलता है या समाज के अंदर संघर्ष होता है या किसी वाह्य प्रेरणा से परिवर्तन की क्रांति आती है तब पुरानी प्रथाएँ समाज में अव्यवहारिक हो जाती हैं. और विचत्र लगने लगती हैं.नियोग भी ऐसी ही पशुतुल्य कुप्रथा थी.

   ऐसी प्रथाओं की गणना गर्हित प्रथाओं में होने लगती हैं.यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि गर्हित का अर्थ है मूलतः ऐसी चीज जो समाज को स्वीकार्य ना हो.इस प्रकार की गर्हित वर्तमान समाज को अमान्य और समाज को विलक्षण प्रतीत होने वाली स्वस्त्रीसमर्पण के अतिरिक्त अन्य कई प्रथाएँ वैदिक आर्य समाज में प्रचलित थी जिसप्रकार पृथ्वी के अन्य प्राचीन तथा अर्वाचीन न्यूनाधिक अन्यान्य समाजों में प्रचलित थीं.इनमें से कई प्रथाओं का उल्लेख शास्त्रों में मिल जायेंगी.

         इतिहासाचार्य काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े जी ने अपनी शोध में विस्तृत बताया है..Published from Blogger Prime Android App

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