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1811 में अंग्रेजों ने पहला स्कूल खोला था,तब हमारे यहाँ 7.32 लाख गुरुकुल थे..!

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इंग्लैंड में 1811 में पहला स्कूल खुला था तब भारत में 7.32लाख गुरुकुल थे.. सन् 1891 में भारत में सँस्कृत जानने/बोलने वाले कुल जमा लोग थे सिर्फ 308,,,🙆 इनके परदादा ने इनके दादा को, इनके दादा ने इनके पिता को इनके पिता ने इन्हें और इन्होंने अपने बेटे को गुरुकुल में भेजा ही नही इसलिए बन्द हो गए,,,☻️ 👉अब एक छोटी सी कैलकुलेशन है बताता हूँ ,,✍️ सन् 1800 में भारत की टोटल जनसँख्या थी 17 करोड़ यदि इसमें से मुस्लिम, सिख, आदिवासी, ईसाई, जैन आदि की जनसंख्या 02 करोड़ मान के निकाल दो तो बचे 15 करोड़,,,🤔 15 करोड़ में से आधी जनसँख्या महिलाओं की निकाल दो क्यों कि महिलाओं का उपनयन संस्कार नही होता था इसलिये वे गुरुकुल में नही पढ़ सकती थीं तो बची पुरुषों की जनसंख्या 7,5 करोड़,,😌 अब इसमें से शूद्रों (ओबीसी)/ शैड्यूल (एससी-एसटी)की जनसंख्या (85% के हिसाब से)निकाल दो  क्यों कि उनका उपनयन मनुस्मृति के कारण नही होता था तो गुरुकुल में प्रवेश निषेध था तो शूद्रों-शैड्यूल के पुरुषों की संख्या हुई लगभग 6,5 करोड़ तो बची सवर्णो की जनसँख्या 01 करोड़,,,😇 अब 01करोड़ में से बूढ़ों और अधेड़ों की जनसंख्या मान लो तो बचे 50 लाख ...

वैदिक गर्हित अनैतिक परंपराएँ●●●

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वैदिक काल से पाणिनि के काल तक वैदिकों के बीच अपने मित्र या अतिथि को स्वस्त्री संभोगार्थ  सौंपने की प्रथा प्रचलित थी.यह प्रथाएँ आज नीतिबाह्य और अनैतिक लगती है.परंतु इस परिवर्तन शील जगत में सभी वस्तुओं के गतिमान होने के कारण नीतियां भी परिवर्तन शील हैं.स्वयंभू स्थाई अथवा ब्रह्मा की लकीर नहीं.एक विशिष्ट कालावधि में एक विशिष्ट प्रथा नीतिपूर्ण मानी जाती है.और लोग भी उसी में ढल जाते हैं.जब समय बदलता है या समाज के अंदर संघर्ष होता है या किसी वाह्य प्रेरणा से परिवर्तन की क्रांति आती है तब पुरानी प्रथाएँ समाज में अव्यवहारिक हो जाती हैं. और विचत्र लगने लगती हैं.नियोग भी ऐसी ही पशुतुल्य कुप्रथा थी.    ऐसी प्रथाओं की गणना गर्हित प्रथाओं में होने लगती हैं.यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि गर्हित का अर्थ है मूलतः ऐसी चीज जो समाज को स्वीकार्य ना हो.इस प्रकार की गर्हित वर्तमान समाज को अमान्य और समाज को विलक्षण प्रतीत होने वाली स्वस्त्रीसमर्पण के अतिरिक्त अन्य कई प्रथाएँ वैदिक आर्य समाज में प्रचलित थी जिसप्रकार पृथ्वी के अन्य प्राचीन तथा अर्वाचीन न्यूनाधिक अन्यान्य समाजों में प्रचलित थीं.इनमें स...

हिंदू भाईयों को भी हूरें मिलती हैं..

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सिर्फ मुस्लिमों को ही जन्नत में 72 हूरें नहीं मिलती, स्वर्ग में भी भग्तों को अप्सराएं, देवकन्याएं, देवांगनाएं, सुंदर कन्याएं मिलती हैं। महाभारत व पुराणों में ऐसी सुंदरियों का जिक्र किया गया है। कुछ उदाहरण महाभारत गीता प्रेस गोरखपुर के अनुशासन पर्व से है :–  🔸जमीन, जायदाद, गांय, बैल, आदि ब्राह्मण को दान देने वाले तथा व्रत करने वाले को जहाज में बैठाकर स्वर्ग में ले जाया जाता है और फिर ऐसे भगत के मनोरंजन के लिए स्वर्ग में विभिन्न व्यवस्थाएं की जाती हैं -  1️⃣ सुंदर वस्त्र आभूषणों से विभूषित सैकड़ों अप्सराएं सेवा में हाजिर रहती हैं ( अध्याय 62 श्लोक 88 ) 2️⃣ मनोहर वेश और सुंदर नितंबों वाली ( पिछवाड़े वाली ) हजारों देवांगनाएं उससे रमण करवाती हैं ( रमण का अर्थ गूगल पर देखें ) अध्याय  79 श्लोक 25 ) 3️⃣ सुंदर अप्सराएं उसके साथ क्रीड़ा करती हैं। ( अध्याय 81 श्लोक 30 ) 4️⃣ 16 वर्ष की सी अवस्था वाली नूतन यौवन वाली तथा मनोहर रूप विलास से सुशोभित देवांगनाएं उसे प्राप्त होती हैं। ( अध्याय 107 श्लोक 38 ) 5️⃣ परम सुंदर मधुर भाषिणी दिव्य नारियां उसकी पूजा करती है तथा उससे काम भोग का सेवन...

काशी शास्त्रार्थ में दयानंद की शर्मनाक पराजय..

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स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती एवं स्वामी दयानंद सरस्वती का वो ऐतिहासिक का शास्त्रार्थ काशी में हुऐ कुछ ऐतिहासिक शास्त्रार्थ और दयानंद कि हार। प्राचीनकाल से ही काशी में प्रतिदिन शास्त्रसभा का आयोजन होता था।सभा में विराजमान शास्त्रमहारथी पहले शास्त्रार्थ करते थे तत्पश्चात् दक्षिणा ग्रहण करते थे।नागपञ्चमी के दिन काशी के नागकुआँ पर शास्त्रज्ञों तथा छात्रों में शास्त्रार्थ करने की परम्परा वर्तमान में भी है। वर्तमान में भी विवाह के अवसर पर कन्या और वर पक्ष के विद्वान् परस्पर विविधोपयोगी प्रमेयों पर शास्त्रार्थ करते हैं।अब इस परम्परा का ह्रास होने लगा है।काशी चूँकि व्याकरणशास्त्र की अध्ययनस्थली तथा महर्षि पतञ्जलि की कर्मस्थली होने के कारण शास्त्रविषयक उहापोह के लिए पुरातनकाल से ही जानी जाती है। विद्वानों की क्रीडास्थली काशी में वर्षों से ऐतिहासिक शास्त्रार्थ सम्पन्न हुऐ है।कुछेक शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध भी किया गया है परन्तु अधिकांश प्रसिद्ध शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध ही नहीं किया गया है। ‘वैयाकरण केशरी महामहोपाध्याय पण्डित दामोदर शास्त्री’ तथा मैथिल विद्वत्वरेण्य ‘पण्डित बच्चा झा’ के मध्य जो अद...

सवर्णो के शोषण और अंग्रेजों के सुधार..

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#इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है। #अंग्रेजों ने राज करने के साथ-साथ कुछ परिवर्तन भी लाए हैं। जो कि इस प्रकार से है👇 #ब्राह्मण_जज_पर_रोक  सन 1919 ईस्वी में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनने पर रोक लगा दी थी, अंग्रेजों का कहना था कि इनका चरित्र न्यायिक नहीं होता। ये लोग हिंदू धर्म ग्रंथ मनुस्मृति वर्ण व्यवस्था जाति आधार पर न्याय करते हैं। #सरकारी_सेवाओं_में_प्रतिनिधित्व  अंग्रेजों ने शुद्र वर्ण की जातियों को सरकारी सेवाओं में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की।  #गंगा_दान_प्रथा शूद्रों के पहले लड़के को ब्राह्मण गंगा में दान करवा दिया करते थे क्योंकि वो जानते थे कि पहला बच्चा हष्ट पुष्ट होता है। अंग्रेजों ने इस प्रथा को रोकने के लिए 1835 में एक कानून बनाया था।  #नववधू_शुद्धीकरण_प्रथा 1819 से पहले जब किसी शूद्र की शादी होती थी तो ब्राह्मण उसका शुद्धीकरण करने के लिए नववधू को 3 दिन अपने पास रखते थे, इस प्रथा को अंग्रेजों ने 1819 ईस्वी में बंद करवा दिया था। #सम्पत्ति_का_अधिकार  अंग्रेजों ने अधिनियम 11...

वेदों में इतिहास

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वेदार्थ करने में,देवता की भूमिका विषयवस्तु के रूप में है,विनियोग की भूमिका प्रयोजन के लिए है। किन्तु ऋषि का उल्लेख उस मन्त्र का इतिहास बताने जानने के लिए होता है। यही वेदों में सर्वत्र है। इन ऋषियों  मे भी केवल एक वर्ण के ऋषि नही चतुर्वर्णी नर नारी हैं जो चरणी,कूँडी,सोटा ,सिल ,बट्टा, दवा,बूटी , छलनी का भी प्रयोग करते कराते हैं।और दयापंथी कहते हैं वेदों में इतिहास ही नही है! प्राकृति भी इतिहास बयां करती है ... आज यह विधा जी़योलाजी कहलाती है।लेकिन दयापंथी इतिहास किसे मानते हैं,यह कोई नही जानता😎 गृत्समदेयों,माधुछान्सों,आत्रेयों,काण्वों,भार्गवों,आथर्वणों,सरमा,सर्पाक्षी आदि ऐतिहासिक ऋषि ऋषिकाओं के मंत्र कृत्यों से साबित होता है कि  वेदों में इतिहास है. अपने हिसाब से अर्थ अनर्थ करनेवाले दयापंथी  गाली गलौज और कोसना जानते हैं.      वेद मतलब ईजेन्दावेस्ता अवेस्ता के बहुत से हिस्सो और अथर्ववेद के मंत्रों के बीच भाषा, उच्चारण और कथ्य की जबरजस्त समानताएं मौजूद हैं। जरथुस्त्र के पिता का नाम पौरुषास्प् और उनके काबिले का नाम स्पितामा( पितामह) था । अवेस्ताई देवताओं के नाम...

अहिल्या ही दोषी क्यों??

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 प्रकरण में दयापंथी अभी तक निरुत्तर हैं.. गौतम ऋषि के शाप के प्रभाव से अहिल्या तीनों लोकों में अदृश्य हो गई.. सा हि गौतमवाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह। त्रयाणामपि लोकानां यावद्रामस्य दर्शनमागता।।१-४९-१७           यहाँ वाल्मीकि रामायण से ही साबित हो रहा कि गौतम ऋषि थे ना कि चंद्रमा अहिल्या उसकी पत्नी थी.जिससे इंद्र ने व्याविचार किया. और नारी होने का दण्ड अहिल्या को मिला. इंद्र बच निकले. इस शाप से भगवान श्रीराम ने उद्धार किया. और अहिल्या ने भगवान राम के चरण स्पर्श किया. पैर धोने के लिए जल दिया. #पाद्यमर्घ्यं_तथातिथ्यं_चकार_सुसमाहिता।।     दयापंथी  डामेज कंट्रोल की नकाम कोशिश कर रहे हैं. सत्य स्वीकारें सत्यग्रही बनें. विष्ठाग्रह त्यागें #मनुर्भव।।