ईश्वर भगवान है तो दिखाई क्यों नहीं देता??
भगवान दिखाईं क्यों नहीं देते?
परमेश्वर ब्रह्माण्ड का जो संगठित रूप है.वही सारी सृष्टि का कर्त्ता है,सारी ऊर्जाओं और ज्ञान का स्रोत वही है. "मैं हूँ" ही ईश्वर है.बाईबल में ईश्वर ने अपना परिचय यही बताया है.(यदि वे मुझसे पूछें,'उसका क्या नाम है?'तब मैं क्या बताऊँ?'परमेश्वर ने मूसा से कहा-"मैं जो हूँ सो हूँ"फिर उसने कहा -"तू इस्राईलियों से यह कहना 'जिसका नाम "मैं हूँ"है.....निर्गमन3:13-14)
भारतीय दर्शनों में इसको अलग अंदाज में बयां किया गयाहै.ज्ञान को ही ईश्वर की वाणी बताया गया है. ज्ञान का स्रोत ईश्वर ही है. ज्ञान अर्थात वेद।।वेद अर्थात ईश्वर की वाणी. वेद में व्यवहारिक और औपचारिक ज्ञान और सहज ज्ञानों को भी ईश्वरीय ज्ञान बताया गया है.वेद का ज्ञान सांसारिक है इसे ब्यवहार में लाकर इंसान इंसान बन सकता है.यहाँ ज्ञान की महिमा है. ज्ञान के स्रोत का नहीं।स्तूति उसकी होनी चाहिए जो मूल हो,स्रोत हो.
बाईबल उसी मूल शक्ति केंद्र,एक सर्वशक्तिमान सत्ता से उत्पन्न होने का अनुमान व विश्वास व सम्भावना और इतिहास को पुख्ता करता है. *अब यदि संसार में एक सर्वशक्तिमान व सृष्टि और प्राणियों की रचना करने वाली व संसार को व्यवस्थित रूप से चलाने वाली सत्ता है कोई ईश्वर अगर है. तो वह दिखाई क्यों नहीं देता?इसका उत्तर है कि हम स्वयं की आत्मा को भी तो नहीं देख पाते। हमने कई बार मृत्यु का दृश्य देखा है परन्तु हमें मृत्यु के समय जीवात्मा का शरीर से निकलना तो अनुभव होता है परन्तु शरीर से निकलने वाला चेतन तत्व “जीवात्मा” आंखों से किसी को कहीं दिखाई नहीं देता। फिर भी हम आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। हम सभी में यहां तक की पशुओं में भी “मैं हूं” की अनुभूति हर क्षण होती है और “मैं नहीं हूं” की अनुभूति किसी को कभी नहीं होती। इसी प्रकार संसार में आत्मा की तरह दिखाई न देने पर भी एक सर्वव्यापक, निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ सत्ता का अनुमान होता है। दिखाई न देने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह सत्ता या ईश्वर है ही नहीं। इसको इस प्रकार से भी समझ सकते हैं कि हम जिस वस्तु को देखते हैं तो इसमें हमे क्या दिखाई देता है? हमें उस वस्तु के गुण व कर्म दिखाई देते हैं। गुण व कर्म हमेशा गुणी में निहित होते हैं। हम अपने प्रिय मित्र को देखते हैं तो हम कहते हैं कि हमने उसको देखा। हम उसके शरीर व अंगों को तथा उसके कर्मों वा कार्यों को देखते हैं अथवा उसकी वाणी को सुनते हैं। क्या यह शरीर, उसके अंग-प्रत्यंग व उसकी वाणी ही वह व्यक्ति है, नहीं यह तो उसका बाह्य स्वरूप है। मनुष्य का एक हाथ कट जाये तो भी वह जीवित रहता है। पैर कट जाये तो भी जीवित रह सकता है। आंखों से दिखाई न देने, कानों से सुनाई न देने, नांक से न सूघने और मुंह से बोलना सम्भव न होने पर भी मनुष्य तो रहता ही है। यह सब अंग तो एक तत्व “मैं” के होते हैं जो कहता है कि यह मेरा हाथ है, मेरा पैर, मुंह, जिह्वा, नाक, कान व आंख आदि हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि "मैं हूँ"मैं हूँ तो ईश्वर है. इसमें रत्ती भर भी संदेह करना,खुद के होने का इंकार करना है.
उस कर्त्ता की सबसे अनुपम कृति मानव है. मानव कोे उसने आरंभ से परीक्षाओं में स्वतंत्र छोड़ा कि सृष्टि पर अधिकार रखे.ज्ञान की खोज करे और उसे छोड़ और किसी और कल्पित देवों,शैतानों, सृष्टि की इबादत न करे लेकिन इंसान कल्पित बाल देवताओं, मूर्तियों, प्रकृति को पूजने लगा.इंसान भ्रष्ट हुआ, कुकर्मी हुआ, तानाशाह हुआ.दुराचारी,व्याविचारी हुआ तमाम बुराइयों में लिप्त हुआ. इन्हीं बुराइयों से तौबा करने के लिए आगाह और चेतावनियों के लिए उसने धरती पर उसने पैगम्बर, नबी, संत, ऋषि, महापुरुष, भगवान,सुधारक, भविष्यवक्ता उतारा. पर इंसान हठधर्मी हुआ. नहीं चेता.तब उसने स्वयं धरती पर शरीरधारी होकर आया क्योंकि उसकी दिलचस्पी अपनी अनुपम कृति को बचाने पर है.इंसान फिर भी नहीं चेता.अब उसके सब्र की इंतहा हो गई. कयामत के दिन और न्याय के दिन करीब हैं. इंसान का तराजू उसके हाथ होगा. अब गुनाहों का हिसाब होगा.

Comments
Post a Comment