पुनर्जन्म सत्य है या मिथ्या??

#पुनर्जन्म तथ्य,सत्य या मिथ्या???

आवागमन लफ्ज़ कहाँ है वेदों में ?

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पुनर्जन्म लफ्ज़ लिखे श्लोको में आवागमन के कॉन्सेप्ट को फिट कर के मिलावट किसने की वेदों में ?

पुनर्मनः पुनरायुर्म आगन्

पुनः प्राणः पुनरात्मा म आगन्

पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं म आगन्।

वैश्वानरो अदब्धस्तनूपा

अग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्॥3॥

-यजु॰ अ॰ 4। मं॰ 15॥

पुनर्मैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च।

पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामि हैव॥4॥

-अथर्व॰ कां॰ 7। अनु॰ 6। व॰ 67। मं॰ 1॥

आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद

ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि।

धास्युर्योनिं प्रथमः आ विवेशा

यो वाचमनुदितां चिकेत॥5॥

-अथर्व॰ कां॰ 5। अनु॰ 1। व॰ 1। मं॰ 2॥

भाषार्थ - (पुनर्मनः पुनरात्मा॰) हे सर्वज्ञ ईश्वर! जब जब हम जन्म लेवें, तब तब हम को शुद्ध मन, पूर्ण आयु, आरोग्यता, प्राण कुशलतायुक्त जीवात्मा, उत्तम चक्षु और श्रोत्र प्राप्त हों। (वैश्वानरोऽदब्धः) जो विश्व में विराजमान ईश्वर है, वह सब जन्मों में हमारे शरीरों का पालन करे। (अग्निर्नः) सब पापों के नाश करनेवाले आप हम को (पातु दुरितादवद्यात्) बुरे कामों और सब दुःखों से पुनर्जन्म में अलग रखें॥3॥

(पुनर्मैत्विन्द्रियम्) हे जगदीश्वर! आप की कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिय मुझ को प्राप्त हों अर्थात् सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे। (पुनरात्मा) अर्थात् प्राणों को धारण करने-हारा सामर्थ्य मुझ को प्राप्त होता रहे। जिस से दूसरे जन्म में भी हम लोग सौ वर्ष वा अच्छे आचरण से अधिक भी जीवें। (द्रविणं) तथा सत्यविद्यादि श्रेष्ठ धन भी पुनर्जन्म में प्राप्त होते रहें। (ब्राह्मणं च) और सदा के लिए ब्रह्म जो वेद है, उस का व्याख्यानसहित विज्ञान तथा आप ही में हमारी निष्ठा बनी रहे। (पुनरग्नयः) तथा सब जगत् के उपकार के अर्थ हम लोग अग्निहोत्रादि यज्ञ को करते रहें। (धिष्ण्या यथास्थाम) हे जगदीश्वर! हम लोग जैसे पूर्वजन्मों में शुभ गुण धारण करनेवाली बुद्धि से उत्तम शरीर और इन्द्रियसहित थे, वैसे ही इस संसार में पुनर्जन्म में भी बुद्धि के साथ मनुष्यदेह के कृत्य करने में समर्थ हों। ये सब शुद्धबुद्धि के साथ (मैतु) मुझ को यथावत् प्राप्त हों। (इहैव) जिन से हम लोग इस संसार में मनुष्यजन्म को धारण करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सदा सिद्ध करें और इस सामग्री से आप की भक्ति को प्रेम से सदा किया करें। जिस करके किसी जन्म में हम को कभी दुःख प्राप्त न हो॥4॥

(आ यो धर्माणि॰) जो मनुष्य पूर्वजन्म में धर्माचरण करता है, (ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि) उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता, और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त होता है। (धास्युर्योनिं॰) जो पूर्वजन्म में किए हुए पाप पुण्य के फलों को भोग करने के स्वभावयुक्त जीवात्मा है, वह पूर्व शरीर को छोड़ के वायु के साथ रहता है , पुनः जल ओषधि वा प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है , तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर होके पुनः जन्म लेता है। (यो वाचमनुदितां चिकेत) जो जीव अनुदित वाणी अर्थात् जैसी ईश्वर ने वेदों में सत्यभाषण करने की आज्ञा दी है वैसा ही (आचिकेत) यथावत् जान के बोलता है और धर्म ही में (ससाद) यथावत् स्थित रहता है, वह मनुष्ययोनि में उत्तम शरीर धारण करके अनेक सुखों को भोगता है। और जो अधर्माचरण करता है, वह अनेक नीच शरीर अर्थात् कीट पतंग पशु आदि के शरीर को धारण करके अनेक दुःखों को भोगता है॥5॥

सवाल है जब आवागमन है तो फिर वहाँ पुनर्जन्म कैसे ??

पापों की सजा इसी जन्म में क्यों पूरी नहीं होती...?अगले जन्म के लिए पाप शिफ्ट क्यों?

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