रामराज....
#रामराज में..
#सभी_वैदिक_धर्मी_थे..
#सपने_में_भी_पाप_नहीं_करते_थे..
#कोई_गरीब_नहीं_था_कोई_अल्पायु_में_नहीं_मरता_था.
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य को निम्न प्रकार वर्णित किया है—
चौपाई :
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥1॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥2॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥3॥
#शेर_और_हिरण_मित्रवत_रहते_थे।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥ #सभी_पुरुष_परोपकारी_और_एकपत्नीव्रती_थे.
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥4॥ #लताएँ_बोलने_मात्र_से_मधु_टपकाते_थे. गायें मनचाहा दूध देती थीं.
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी
#समुद्र_भी_बोलने से_रत्न_उगलते_थे..
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
#माँगने_मात्र_मेघ_बरस_जाते थे.
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥
सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यक है
#रामचंद्र_जी_सहस्त्रों_अश्वमेध करते थे और #ब्राह्मणों_को दान देते थे..भरसक वेदों का पालन करने की कोशिश करते थे.
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥1॥

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