क्या ईसा मसीह ईश्वर है??
"तुम लोग यीशु को भगवान बोलते हो पर अगर वो भगवान होते' तो अपने आप को क्रूस पर चढ़ने से क्यों नही बचा पाए ?
वो तुम्हें क्या खाक बचाएंगे जो अपने आप को नहीं बचा पाए!!
यह सवाल आज से २००० वर्ष पहले भी उठा था, क्रूस पर कीलों से जकड़े, लहूलुहान मरते प्रभु यीशु के सामने खड़े, जन समूह ने उठाया था आज वही सवाल लोग सोशल मीडिया पर, फेसबुक ट्वीटर और तमाम मंचों पर उठा रहे हैं.
लोग और सरदार भी ठट्ठा कर करके कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले।
सिपाही भी ठट्ठा करके कहते थे।
यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा।
जो कुकर्मी साथ में सलीब पर लटकाये गए थे, उन में से एक ने उस की निन्दा करके कहा; क्या तू मसीह नहीं तो फिर अपने आप को और हमें बचा। - लूका २३:३५-३९
भाई हम भी, आपके समान प्रभु यीशु को मात्र एक आम 'इंसान' या एक 'गुरु' या उस समय के धार्मिक ठेकेदारों की तरह 'धोखेबाज़, ही मान लेते।
यदि
प्रभु यीशु मरने के बाद जीवित नहीं होते,और तब आप का कहना भी सच होता जो स्वयं कब्र में हैं वह किसी को कैसे बचाये वो कैसे ईश्वर कहलाते?
और सवाल ये भी है.....
कि क्या किसी 'झूठ'(प्रभु यीशु ) के लिए भी कोई मरने को तैयार होता है। रोमी सरकार और यहूदियों की धार्मिक सरकार ने मिलकर हज़ारों को आग में जलाया, जंगली जानवरों से रोम के कॉलोसिउम्स में मरवाया, घरों से शहरों से बेदखल किया जेलों में भूखों मारा।
यदि प्रभु यीशु वो नहीं थे..
जो उन्होंने दावा किया तो कौन अपनी जान देता?धन संपत्ति, परिवार, मान सम्मान खोता,?
आज भी प्रभु यीशु से मुक्ति पाए हज़ारों लोग इस संसार में जान देकर यीशु के पीछे चलने को तैयार हैं। और अपने शत्रुओं और सतानेवालों से प्रेम करते हैं।

(प्रभु यीशु के जीवन की हर भविष्यवाणी उनके आने के सैंकड़ों साल पहले बाइबिल में लिखी थीं।)
प्रभु यीशु परमेश्वर का 'उपाय' हैं और आये ही इसलिए थे कि मनुष्य के पाप के लिए स्वयं बलिदान हों, और पवित्र लहू बहाकर मनुष्य की मुक्ति की कीमत अदा करें।
क्योंकि परमेश्वरका वचन कहता है पाप की मज़दूरी (परिणाम) मृत्यु है। पाप कर्म में ही नहीं हमारे विचारों में भी बीज की तरह होता है। हत्या और क्रोध बराबर है, चोरी और लालच बराबर है, व्यभिचार और वासना बराबर है। - मत्ती ५, ६, ७
"पाप न कर्म से मिट सकते हैं, और न ही मुक्ति सोने, चांदी या धन से खरीदी जा सकती है। न ही जीवन किसी तीर्थयात्रा से बदलता है"
इस कारण,
ये आवश्यक हो गया कि परमेश्वर स्वयं उपाय निकाले, और हमारी मुक्ति की कीमत जो भी हो अदा करे। प्रभु यीशु का मनुष्य का रूप लेकर आना और परमेश्वर की सामर्थ ओर पवित्रता भी साथ रखने के कारण उन्हें एक और नाम "इम्मानुएल" दिया गया था जिसका अर्थ है 'परमेश्वर हमारे साथ'
प्रभु यीशु का प्रेम इस हद तक था कि वो हमारे पापों का दंड खुद उठाते हैं और उसपर विश्वास करने वाले को मुक्ति देते हैं।
अधर्म और पापियों के नाश के लिए तमाम अवतार हुए मगर ईसा मुक्तिदाता के रुप में आये. उसने पापियों से नहीं पाप से घृणा करना सिखाया.
"प्रभु यीशु ने कोई धर्म की स्थापना नहीं करी, उसने इस संसार में 'परमेश्वर के राज्य' की स्थापना की"
परमेश्वर ने ईसा को ईश्वर करके धरती पर भेजा कि उनके गुनाहों की क्षमा के लिए शरीर का कतरा कतरा लहु बहाये. पाप बलि बने. इस महायज्ञ में ईसा की आहुति हुई.
लेकिन बात यहां खत्म नहीं हुई, तीसरे दिन मृत्यु से वे स्वयं जीवित हो गए और ४० दिन लोगों के बीच आत्मिक बातें सिखाते रहे और लोगों के देखते देखते स्वर्ग पर उठा लिए गए।आज आप यरुशलम शहर में जाकर उसकी खाली कब्र देख सकते हैं।
प्रभु यीशु ने अनेकों चमत्कार किये, और मरे हुओं को भी जीवित किया था, लेकिन इन सब से बढ़कर वो हमें मृत्यु पर जय , याने आत्मा की मुक्ति और शाश्वत जीवन देने आए थे।
आज लाखों लोग हैं जिनके पापी गंदे ,शराबी, जुआरी हत्यारे और क्रिमनल जीवन को बदलकर प्रभु यीशु ने अपना जीवन दिया है ।
ये सभी प्रभु यीशु के ईश्वरत्व के गवाह हैं।
प्रभु यीशु ने दावे से कहा, मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूँ, बिना मेरे द्वारा कोई पिता परमेश्वर(मुक्ति) के पास नहीं पहुंच सकता। यूहन्ना १४:६
जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है
हमारी प्रार्थना है कि प्रभु यीशु आप को भी नया जीवन और मुक्ति दान दें
आज सवाल है...
या तो प्रभु यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पुत्र, सृष्टिकर्ता, जीवनदाता, मुक्तिदाता, तारणहार हैं जो अपने वचन की सामर्थ से सारे ब्रह्मांड को थामे हुए हैं
या
झूठे इंसानो, गुरुओं, ईश्वरों की कड़ी में एक और ..हैं। 

https://youtu.be/OldNsQLiFBs
Comments
Post a Comment