यह भ्रम फैलाया गया है कि पंडित महेंद्र पाल आर्य पूर्व में मौलवी महबूब अली थे, केवल मौलवी ही नहीं अपितु हाफिज-ए-कुरआन भी थे। ज्ञात हो कि मौलवी वह होता है जिसे कुरआन, हदीस, फिका, तफसीर, अकाइद, इल्म-ए-कलाम, मन्तिक, फलसफा आदि का पूर्ण ज्ञान हो। यह सब ज्ञान अरबी भाषा के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अतः एक मौलवी अरबी भाषा का पूर्ण ज्ञानी होता है। यह कोर्स करीब पन्द्रह वर्षो का है।
कथित पंडित महेद्र पाल आर्य को ढंग की उर्दू पढ़ना, बोलना नहीं आता अरबी जुबान भी लड़खड़ाती है और वो इमाम थे.घोर आश्यर्च!!
मेहन्द्रपाल जी जिस प्रकार की अरबी लिखते हैं या अरबी का अनुवाद करते हैं उसे देख कर लगता है कि किसी गैर मुस्लिम ने बोझल मन से इस्लाम पर एतराज करने के लिये अरबी सीखी है मैं कई ऐसे गैर-मुस्लिम भाई हैं जो शौकिया या उर्दू अध्यापक की नौकरी पाने के लिये उर्दू सीखी है। परन्तु इस प्रकार कोई भाषा सीखी जाए कि न तो उसे पूरा समय दिया जा सके और न ही पूरे मन से उसे सीखा जाए, ऐसे व्यक्तियों द्वारा सीखी गई कोई भी भाषा पुख्ता नहीं हो सकती। उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है? जो अंग्रेजी शब्द Station को istashan लिखे या Light को Lait या High को Hai लिखे। बस यही हाल बल्कि इससे भी अधिक बुरा हाल महेन्द्रपाल का है उन्हों ने इसी प्रकार के कुछ प्रश्न इन्टरनेट पर डाले थे जिसका कई लोगों ने उत्तर दिया है।😊😊😊
दूसरी डिग्री महेन्द्रपाल (महबूब अली) के पास उनके दावे के अनुसार हाफिज की भी थी। हाफिज़ वह होता है जिसे पूरा कुरआन मुंह जुबानी कंठस्थ हो, और वह जहाँ से चाहे खडे-खडे़ कुरआन पढ़ कर सुना सके।
महेंद्र पाल यहाँ भी खरे नहीं हैं.महेन्द्रपाल का यह दावा कि वह मौलवी थे निराधार, बेतुका और निरा झूठ है। बल्कि हमें तो इसमें भी शक है। कि वह महबूब अली थे।
उनका मूल निवास स्थान कलकत्ता है। इस समय वह दिल्ली में रहते हैं और आर्य समाज के प्रचारक हैं। दिल्ली में रहने वाले किसी व्यक्ति का मूल पता कलकत्ते जैसे बडे़ और दुर्गम शहर में तलाश करना बड़ा कठिन कार्य है। परन्तु हम यह जानते है कि बंगला भाषी कलकत्ता शहर का मूल निवासी कितना ही बड़ा विद्वान क्यों न बन जाये बंगाली भाषा का असर उस की जुबान से कभी नहीं जाता इस की उचित मिसाल हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी है जिनकी अग्रेजी भी बंगाली नुमा होती है। दूसरी ओर महेन्द्रपाल जी है जो अपने भाषण में जिस प्रकार की शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करते हैं उसे सुनकर लगता है कि वह दिल्ली के आस-पास किसी हिन्दी भाषी क्षेत्र के निवासी हैं कम से कम उनकी भाषा शैली से यह तो बिल्कुल नहीं लगता कि वह बंगाली हैं।
श्री महेन्द्रपाल का दावा है कि उन्होंने दिल्ली के मदरसा अमीनिया से आलिम (मौलवी कोर्स) से फरागत हासिल की है। उक्त से यह तो साबित हो गया है कि वह किसी मदरसे से सनद याफ्ता आलिम नहीं हो सकते हाँ यह मुमकिन है कि किसी महेन्द्रपाल ने फर्जी नाम महबूब अली रख कर किसी मदरसे में दाखिला ले लिया हो और एक या दो वर्ष अरबी भाषा व आलिम (मौलवी का कोर्स) की शिक्षा प्राप्त की हो। जबकि यह कोई नयी बात नहीं, ऐसी और भी मिसाले सुनने में आती रही हैं
महेंद्र पाल कौन से मस्जिद के इमाम थे??वहाँ रहने वाले महेंद्र पाल को जानते तक नहीं हैं.
महेन्द्रपाल जब महबूब अली से महेन्द्रपाल बने तो उन्होंने कौन सा वर्ण ग्रहण किया। वह पहले मलेच्छ थे अर्थात शुद्र से भी नीचे। उन्होंने अपना शुद्धिकरण कराया, तो भी वे अधिक से अधिक शुद्र की श्रेणी में आ सकते थे। क्यों कि ‘‘तोहफतुल हिंद’’ के लेखक जिनका पहला नाम ‘‘अनंत राम’’ था और उन्होंने इस्लाम कुबूल करने के बाद अपना नाम मुहम्मद उबैदुल्लाह रखा उन्होंने अपनी मशहूर किताब ‘‘तोहफतुल हिंद’’ में कर्मव्याक के हवाले से लिखा है कि अगर कोई शुद्र पुन्य के कार्य करे तो वह अगले जन्म मे वैश्य कुल को पाता है और अगर कोई वैश्य पुनः के कार्य करे तो व क्षत्रीय वर्ण में। ऐसे ही क्षत्रिय ब्राह्मण कुल में और ब्राह्मण पुन्य करे तो उसकी मुक्ति हो जाती है।
परन्तु यह व्यवस्था तो मरनोपरान्त की है, प्रश्न यह है कि महेन्द्रपाल जी जीते जी ब्राह्मण या पंडित कैसे बन गये हैं!!??
#आर्य समाजियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले सवाल.. 🤔यहोवा ने भले बुरे ज्ञान के फल को आदम से झूठ बोलकर दूर क्यों रखा? 🤔ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ है,तो धूर्त शैतान को क्यों बनाया? 🤔वह पूर्व जन्म नहीं मानता तो बिना अपराध के शैतान को अपराधी क्यों ठहराया? 🤔शैतान को ईश्वर ने ही बनाया तो शैतानी कामों का भागीदार ईश्वर भी है. समाजी बंधुओं बाईबल समझने के लिए संपूर्ण बाईबल का अध्ययन आवश्यक है. खंडित आयतों से नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता. जिस तरह पके आम का स्वाद जानने के लिए आम के बौराने, फलने और पकने का इंतजार करना होगा. आम के बौर खा लेने से पके आम के स्वाद का अनुमान लगा पाना मुश्किल है. दयानंद जी ने यही हड़बड़ी की है. उन्होंने आम की पत्तियां चबाकर पके आम का स्वाद अनुमान और कयास बताया है. ईश्वर ने शैतान कभी नहीं बनाया ऐसे में यह कहना कि शैतान और उसके शैतानी कार्यों का भागीदार ईश्वर भी है. यह सर्वथा अनुचित है, गलत है. पूर्व जन्म मिथ्या है, कयास है अतः इस पर बातें करना ही समय जाया करना है.बाईबल के अनुसार ...
वैश्विक शैतानी शक्तियों को भारत में शैतानी मण्डली के लिए मोहरे की तलाश थी.आस्तिकता से हताश निराश दयानंद नामक मोहरा उन्हें मिल ही गया. दयानन्द को इस शैतानी मण्डली का पिट्ठू बनाया गया. अब दयानंद एक FREEMASON था. ‘MASONIC शैतान’ माने जाने वाले हेनरी स्टील ओल्काट और मैडम हेलेना ब्लाव्स्की ने 1875 में दयानंद और अपने कई प्लांटेड चेले चपाटों के साथ मिलकर ‘आर्य समाज’ की स्थापना की, आर्य समाज की स्थापना भारत के किसी धार्मिक केंद्रों के बजाय मुंबई में हुयी, जो कि FREEMASONS का केंद्र भी हुआ करता था ज्यादातर लोग जानते होंगे 1870 के दशक में मुंबई से थोड़ी दूर पर स्थित ‘कार्ला की रहस्यमय गुफायें’ जिसे आजकल ‘KARLA CAVES’ कहा जाता है, तांत्रिक शैतानों का अड्डा हुआ करती थीं, कार्ला गुफाओं के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह तंत्र मंत्र और सिद्धियों के लिए बेहतरीन जगह है जहाँ ऐसे कार्य जल्दी सिद्ध होते हैं,कार्ला गुफाओं में MASONS ने ऐसे कई ‘टेलिपैथी मास्टर्स’ INSTALL किये गये थे जिनके जरिये भारत के कई राजाओं और जानी मानी ट...
#ईसाइयों_का_ईश्वर_अन्यायी_है_पाप_क्षमा_करके_पाप_करने_को_प्रोत्साहित_करता_है●●● #दयापंथी बंधुओं क्षमा इसलिए नहीं की जाती कि पाप या गलतियां फिर से दोहराई जायें.रिहाई इसी बिना पे होती है कि दोबारा गुनाह न करो.जहाँ क्षमा का विकल्प नहीं है वहाँ निर्ममता है, दयालुता नहीं. और ईश्वर दयालु है कृपालू है. क्षमा ईश्वर के न्यायी होने पर प्रश्नचिह्न खड़ी नहीं करता. क्योंकि ईश्वर के पास सारे उपाय और हल हैं. हमने देखा है रेप पीड़ित मसीही बहन ने सजा याप्ता गैर मसीही भाई को जेल में राखी बांधते हुए. उसे माफ करते हुए. कर्मों का फल निश्चित है मगर हमारे यहाँ प्रायश्चित और क्षमा का विकल्प भी है. क्षमा को गुनाह करने का लाईसेंस समझना बेईमानी है.क्षमा ईश्वरीय अनुग्रह है. प्रायश्चित का परिणाम या फल ईश्वरीय अनुग्रह है. ऐसा तो वेद भी बताता है. . बाईबल ईश्वर को देर से क्रोध करनेवाला अति करूणा मय,ईर्ष्या करनेवाला बताती है. यशायाह 30:18 तौभी यहोवा इसलिये विलम्ब...
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