सत्यार्थप्रकाश की सच्चाई और दयापंथी

#सत्यार्थप्रकाश ■■

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निंदा निंदनीय है, आलोचना आईना है

निंदा दंभ लाती है और आलोचना निखार लाती है।

    यूं तो "सत्यार्थ प्रकाश" को धर्मसमीक्षा किताब का नाम दिया गया है,लेकिन इसी की समीक्षा की जाये तो यह एक एक अलहड़ी भाषा प्रयोग की विरोध/निंदा कृति मात्र जान पड़ता है जहाँ ब्याधिन्ह दिमाग के विचारों को बलात् सत्य मनवाने का प्रपोजल है।

समीक्षा के नाम पर यहाँ अर्थ का अनर्थ और विघटनकारी विष परोसी गई है, खुद के ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य कहने के चक्कर में विचारक अपनी दंभी और कुत्सित मानसिकता को असंयमी भाषा में लिपीबद्ध नवाचार करने हेतु प्रयोग करता नजर आयेगा.

इस पुस्तक को न समीक्षा मानी जा सकती है न आलोचना कहा जा सकता है.

           आलोचना इस बात का अन्वेषण है कि सत्य क्या है, सत्य कैसा है?आलोचना बहुत कठोर हो सकती है क्योंकि कभी कभी असत्य को काटने के लिए कृपाण का उपयोग होता है असत्य की चट्टानों को तोड़ने के लिए सत्य के हथौड़े और छैनियां बनानी पड़ती है।

                लेकिन यहां तो छैनियां ही भोत्थर और हथौड़े ही कमजोर हैं।

यहां निंदा रस से ओतप्रोत कयास को थोपने के अलावा और कुछ दीख नहीं पड़ता।जिसे वैदिक ज्ञान(वेद के प्रति हमारा पूर्वाग्रह नहीं) का जामा पहनाकर दयानंदी शागिर्द सर्वश्रेष्ठ कृति समझने की भूल कर रहे हैं।

आडंबरी आर्य चोला ओढ़कर निंदा रस की मदहोशी में कुछ शागिर्द वैदिक ज्ञान के विज्ञापन में उच्च कोटि का गलौच करते नजर आ जाते हैं।

                पर निंदा और विरोध के बल पर कथित ईश्वरीय ज्ञान को संकुचित करने का काम भी यही डबल पर्सनैलिटी के लोग कर रहे हैं

  आलोचना बुरा नहीं,पर निंदा निंदनीय है.

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