अहंकार...

#अहंकार..

नाश होने से पहले मनुष्य के मन में घमण्ड, और महिमा पाने से पहले नम्रता होती है।नीतिवचन 18:12

अहंकार हमारे कंधों पर बैठे शैतान की तरह है. यह हमारे कंधों पर बैठकर हमारा ही विरोधी है. यह हमारी तमाम असुरक्षा, भय,घृणा, गलत धारणा और बुराईयों को पालता पोसता है. यही हमारी नायकत्व का सबसे बड़ा दुश्मन है. यही हमें नाश के अंधेरे रास्ते की ओर धकेलता है, यही हमारे प्रकाश के लिए अंधेरा है.

अहंकार दरअसल एक अपरिपक्व, हाथपैर मारनेवाला, रोने और तेज चिल्लाने वाला बच्चा है. यह हम सभी के पास है...

इससे निजात पाने का उपाय क्या हो सकता है???

निश्चय वह उपाय #नम्रता है. क्योंकि नाश होने से पहले मनुष्य के मन में घमण्ड, और महिमा पाने से पहले नम्रता होती है।

शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात् व्यभिचार, गंदे काम, लुचपन, मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म, डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इनके जैसे और-और काम हैं, इनके विषय में मैं तुम को पहले से कह देता हूँ जैसा पहले कह भी चुका हूँ, कि ऐसे-ऐसे काम करनेवाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे। पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, और दया, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे-ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं।

और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी। हम घमण्डी होकर न एक दूसरे को छेड़ें, और न एक दूसरे से डाह करें।

गलातियों 5:24-26

और अगर घमण्ड करना ही है तो...परन्तु जो घमण्ड करे, वह प्रभु पर घमण्ड करें। (1 कुरि. 1:31, यिर्म. 9:24)

2 कुरिन्थियों 10:17

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