पुनर्जन्म तथ्य या मिथ्या??

पुनर्जन्म तथ्य या मिथ्या??

भाग 3 नित नए विचारों का जन्म होता है ना कि आत्मा या शरीर का।

     पुनर्जन्म थ्यौरी मिथ्या है सत्य नहीं. पुनर्जन्म से संबंधित तमाम ऐसे वीडियो,ऑडियो सामने आये जो जांच में झूठे साबित हुए हैं. जैसे 1:एक बालक पुनर्जन्म लेकर अपने हत्यारों को पकड़वाया.2:राजस्थान का एक बालक जिसे पिछले जन्म की सारी बातें याद हैं..वगैरह.ऐसे खबर जरूर सुर्खियों में रहे लेकिन अफवाह साबित हुए.

        यादाश्त मस्तिष्क में संधारित होता है. व्यक्ति की मृत्यु के बाद मस्तिष्क भी खाक हो जाता है. माना पुनर्जन्म होता है आत्मा नए शरीर में प्रवेश करती है. यहाँ आत्मा का आना और जाना हुआ ना कि पुनर्जन्म. आत्मा जिस शरीर में प्रविष्ट हुई उसमें नया मस्तिष्क, नया ह्रदय और शरीर के तमाम इंद्रियां नई हैं ऐसे में पिछले जन्म की यादाश्त होना कतई संभव नहीं.आत्मा पिछले जन्म में राम पर थी अब रहीम की शरीर पर है. आत्मा पहले कीर्तन करती थी अब कलमा पढ़ती है...इसी संदर्भ में आर्य बंधु से चर्चाओं का हिस्सा प्रस्तुत है..


आर्य: हमारे आसपास जो कुत्ता-सुअर आदि पशु हैं वे नरक का जीवन जी रहे हैं। जो जन्म से लंगड़े-लूले-अपाहिज हैं देखो उनका जीवन कितना कष्टदायक है! एक टूटी झोपड़ी में रहने वाले गरीब की तुलना अगर बंगलों में रहने वाले सेठ से की जाये तो पिछले जन्म में किये गये पापों का फल मिलना प्रत्यक्ष होता है।

      #खंडन:-कुत्ते-सुवर और तमाम पशु पिछले कर्मों के फल या पूर्व जन्म के पापों की सजा कैसे हैं. इसका प्रमाण क्या है?

आज सारी दुनिया में पाप और गुनाह बढ़ रहे हैं ऐसे में पुनर्जन्म के कयास के अनुसार पशुओं की संख्या बढ़नी चाहिए. इंसानों की बढ़ती जनसंख्या पुनर्जन्म की थ्यौरी को मिथ्या साबित करने के लिए काफी है...

पुनर्जन्म थ्यौरी का मानव जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है. पुनर्जन्म की धारणा समाज में भेदभाव की भावना पैदा कर सकती है कुछ लोग जन्मजात अच्छे और कुछ बुरे समझे जायेंगे, इससे हीन भावना पैदा होगी.यह घमंड और अहंकार को बल देनेवाला होगा.जिसके पास धनदौलत है, संपन्न हैं. वो अपने पिछले जन्म का फल बतायेगा और गरीब दुखी को उपेक्षा की नजर से देखेगा. गरीब और अमीर के बीच द्वेष की लकीर खिंचेगी.1 मनुष्य इस सृष्टी में सबसे अधिक श्रेष्ठ है| पुनर्जन्म के अनुसार मनुष्य बुरे कर्म करता है तो कुत्ते या जानवर की योनी में जन्म लेता है| सोचने की बात यह है कि जो इन्सान सच्चाई न पा सका और बुराई के मार्ग पर चला, उससे यह आशा कैसे की जा सकती है कि जब वो कुत्ता, ऊँट, गधा बनकर जन्म लेगा तो, वह कौनसे शास्त्र या धार्मिक किताबें पढ़कर सत्य को पा लेगा और भलाई करके उच्च कोटि की श्रेणी में आ सकेगा|

पहले मानव की रचना हुई जो श्रेष्ठ है या वनस्पति या पशु की? इन्सान को तो यह भी नहीं पता कि किस कर्म के कारण इंसानों में महिलाएं तथा किस कर्म के कारण पुरुष जन्म लेते है|

 दंड के लिए न्याय की बात यह है कि अपराधी को पता चले कि उसने पिछले जन्म में क्या बुराई की थी| जिसके कारण उसे दंड मिला है| जानवर और पौधो को तो छोडिये, इन्सान को भी नहीं पता कि पिछले जन्म में क्या पाप और पुण्य किये है| यदि इन्सान को पाप और पुण्य का दंड या प्रतिफल, इसी दुनिया में मिल जाता है तो पुनर्जन्म की जरुरत क्या है?

आर्य: मनुष्य को पिछले जन्मों की यादाश्त इसलिए नहीं होती क्योंकि इससे जीवन में अव्यवस्था आ जायेगी. यह न्यायसंगत नहीं है.आपरेशन के दौरान बेहोश किए गए मरीज को यह याद नहीं रहता है कि उसकी चिकित्सा किस प्रकार की गई थी? कभी बुढ़ापे में याददाश्त खो जाने पर व्यक्ति की इस जन्म की स्मृतियाँ तक लोप हो जाती हैं तो हमें पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ किस प्रकार स्मरण रहेंगी? आगे अगर सभी व्यक्तियों को पूर्वजन्म का स्मरण हो जाये तो सांसारिक व्यवस्था भी अव्यवस्थित हो जायेंगी क्योंकि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना अथवा कत्ल से हुई होगी इस जन्म में वह किस प्रकार अपने सामाजिक संबंधों को बनाए रखेगा? इसलिए जिस प्रकार पानी को देखकर वर्षा का, कार्य को देखकर कारण का विद्वान लोग अनुमान लगा लेते हैं उसी प्रकार जन्मजात बिमारियों को देखकर पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का अनुमान हो जाता है।

      #खंडन:-यहाँ फिर से कयास या अनुमान लगाने की बात सिद्ध हो रही है.

सत्यार्थ प्रकाश के नौंवे समुल्लास में भी दावे नहीं बल्कि अनुमान किया है। इसका मुख्य कारण मनुष्य जीवन में किये गये कर्म, ज्ञान प्राप्ति आदि हैं। महर्षि ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है-‘‘सुख-दुःख की घटती बढ़ती देखकर पुनर्जन्म का अनुमान क्यों नहीं लगा लेते? और जो पुनर्जन्म को नहीं मानोगे तो ईश्वर पक्षपाती हो जाता है। बिना पाप के दरियाद्र दुःख और बिना पुण्य के राज्य, धनाढ्य और बुद्धि क्यों मिली। जन्म से लेकर राज-धन, बुद्धि, विद्या, दरिद्रता, मूर्खता, निर्बुद्धि आदि को देखकर पूर्वजन्म का ज्ञान क्यों नहीं करते?’’

        न्याय तो तक जायज होगा. जब सजा पाने वाले को उसके अपराध का बोध हो.

कयासों पुनर्जन्म कहाँ सिद्ध हुआ?वेदों में भी पुनर्जन्म नहीं बल्कि आवागमन है.

‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन् पुनः प्राणः पुनरात्मामऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मेऽआगन्। वैश्वानरोऽअदब्धस्तनूपाऽअग्निर्नः पातु दुरिता- दवद्यात्।’’

           अक्सर इस मंत्र से पुनर्जन्म की कयासें लगाई जाती रही हैं लेकिन यह मंत्र भी पुनर्जन्म को सिद्ध नहीं करता.

आर्य: ईश्वर को न्यायकारी कहा गया है। वह यूँ ही नहीं एक आत्मा को मनुष्य के शरीर से निकालकर सूअर आदि पशु के शरीर में प्रविष्ठ करा देते हैं। अगर ऐसा करने लगे तो ईश्वर की न्यायकारिता पर संशय उत्पन्न हो जायेगा। किसी मनुष्य ने चोरी नहीं की पर उसे कारागार में डाल दिया जाये, किसी मनुष्य ने पाप नहीं किया और उसकी आंखें निकाल ली जायें या उसे अपाहिज बना दिया जाये और उसे कहा जाये कि ऐसा तुम्हारी परीक्षा के लिए किया जा रहा है तो उसे अत्याचार ही कहा जायेगा। आप बताईये अगर आपको किसी दूसरे द्वारा किये गये कत्ल की सजा में आजीवन कारावास का दण्ड दिया जाये तो आप उसे परीक्षा कहेंगे या अत्याचार?

     #खंडन:-नि:संदेह अत्याचार कहेंगे. आर्य की दलीलों में ही विरोधाभास है. अब आर्य बंधु यह बतायें सजा पाने वाले को अपने अपराध का बोध ही ना हो और सजा दे देना क्या न्यायसंगत है?जब दुनिया की अदालत में गुनाह साबित हो जाने पर ही सजा मिलती है जिसका पूरा बोध गुनाहगार को होता है और उसके द्वारा कबूल होने पर ही सजा मिलती है तो ईश्वरीय अदालत में यह अन्याय क्यूँ??

         आर्य बंधु:- भाई मेरे वेद और सत्यार्थ प्रकाश सबकुछ नहीं है. आपकी बातें भी विचारणीय हैं. आप स्वविवेक का इस्तेमाल करें. पुनर्जन्म सत्य है. मगर हम तर्कों से आपको संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं.

      आखिरी संवाद:-मेरे भाई जब आप कोई ठोस तर्क लेकर आयेंगे हम भी पुनर्जन्म थ्यौरी मान लेंगे. हम सत्य के आग्रही हैं. ईसा ने भी कहा था "तुम्हें फिर से जन्म लेना होगा"इसका मतलब ये नहीं कि गर्भ में फिर से जाना पड़ेगा. इसका मतलब ही यह है कि तुम अपने पुराने दकियानूसी धारणा और विचार त्याग कर नये सिरे से सोचो,विचारो,मंथन करो और नई जिंदगी जियो.Published from Blogger Prime Android App

नमस्कार।।

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