नियोग क्या है??

पुराणों मे ऐसे कई प्रकरण मिल जायेंगे जब किसी राजा या अन्य को संतान न होने पर ऋषियों से यज्ञ-हवन करवाने या आशिर्वाद प्राप्त करने से संतानोत्पत्ति हो जाती थी।

रामायण काल मे देखा जाये तो राम और उनके चारों भाइयों का जन्म भी ऐसी ही पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने से हुआ था।

महाभारत काल मे तो कर्ण, पाँचों पाण्डव, पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर समेत कई महापुरुष देवताओं या ऋषियों के आशिर्वाद से ही पैदा हुये हैं।


               अब हम संतानोत्पत्ति के दूसरे पहलु पर आते हैं। प्राचीनकाल मे सनातनियों मे नियोग प्रथा आम बात थी। पूर्वकाल मे जब किसी महिला को अपने पति से संतान नही पैदा होता था तो वह किसी ऋषि या देवता से नियोग करके संतान पैदा करती थी। आगे चलकर इसी प्रथा को मनु ने धार्मिक नियम बना दिया था। मनु ने मनुस्मृति-9/59 (चित्र-1) मे लिखा है-

"देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया।

  प्रजेप्सिताधिगन्तव्या    सन्तानस्य  परिक्षये।।"

               अर्थात- अपने पति और गुरूजनों की आज्ञा से संतान न होने पर स्त्री देवर या सपिण्ड से अभीष्ट (नियोग करके) संतान पैदा करे!

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              अब यह सोचकर ही घृणा होती है कि पूर्वकाल मे संतान के लिये बड़े-बड़े राजा भी अपनी पत्नियों को किसी दूसरे पुरुष को सौंप देते थे।

       वास्तव मे नियोग प्रथा एक घृणित व्यवस्था थी.. नियोग प्रथा का वर्णन मनुस्मृति मे ही मिलता है, पर मनु भी इसे "पशु-धर्म" ही मानते थे।

मनु ने मनुस्मृति-9/65-66  लिखा है-

       "विवाह के वेदोक्त मंत्रों मे नियोग और विधवा विवाह का कही वर्णन नही है। यह पशुधर्म है और विद्वान ब्राह्मणों ने इसकी निन्दा की है। मानव समाज मे बेन राजा के समय मे यह पशु-धर्म प्रचलित हुआ।"


मतलब साफ है कि मनु भी इसे पशुवत्-कृत्य ही मानते थे, और उन्होने यह भी साफ कर दिया कि इसे मैने नही बनाया, बल्कि यह प्रथा तो मुझसे पहले (बेन राजा के समय) से चली आ रही है।


खैर.. अब मै मुख्य-विषय पर आता हूँ। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब पूर्वकाल मे ब्राह्मण इतने तपस्वी होते थे कि यज्ञ करने से या आर्शिवाद देने से पुत्र पैदा करने मे सक्षम थे तो मनु ने नियोग जैसी बकवास प्रथा को क्यों आगे बढ़ाया?

मनु के मनुस्मृति मे लिखना चाहिये था कि- "जब किसी स्त्री को संतान न हो तो वह ऋषियों से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाये अथवा मंत्रोच्चारित फल या खीर खाकर पुत्र पैदा करे। लेकिन इसके बदले मे मनु से किसी पर-पुरुष से सम्भोग करने की सलाह क्यों दी?


यहाँ अंतर्विरोध है बिना स्त्री-पुरुष के समागम से संतान कभी भी पैदा नही होती थीं यह बात मनु भी जानते थे, इसलिये उन्होने न चाहते हुये भी इस निन्दनीय-कृत्य को करने की विधि बनायी, ताकि आगे वंशवृद्धि हो सके। मनु जानते थे कि यदि कोई महिला अपने पति से गर्भवती न होने पर किसी अन्य पुरुष से गर्भधारण करेगी तो समाज उसे कलंकित मानेगा। इसीलिये उन्होने नियोग को धार्मिक प्रावधान बना दिया, ताकि न तो समाज महिला की निन्दा कर सके, और महिला भी आत्मग्लानि से बची रहे।यह मान लिया जाये फिर....!?


यह भी कि पुराणों और रामायण/महाभारत मे जितने भी महापुरुष मंत्रोच्चारित फल अथवा खीर पीने से, या देवताओं अथवा ऋषियों (ब्राह्मणों) के आशिर्वाद से पैदा हुये हैं, वे सब नियोग द्वारा ही जन्मे हैं। लेकिन ग्रंथों को लिखने वालों ने इस बात को छुपा दिया है। यदि पूर्वकाल मे सचमुच ऐसे चमत्कृत ढ़ंग से संतान पैदा करने की कोई भी विधि होती तो मनु कभी भी "नियोग-प्रथा" को धार्मिक प्रावधान न बनाते।Published from Blogger Prime Android App

नियोग की महिमा गाने वाले दयापंथी(आर्य समाजी) बाईबल कुरान आदि पर नियोग बताते हैं. तो ईसाइयों मुसलमानों को भी दयापंथियों की पर यह कह देना चाहिए कि यह प्रक्षिप्त है मिलावट है??😊

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