दयानन्द का संदिग्ध ज्ञान..

#स्वामी_दयानंद_संदिग्ध_ज्ञान..

पुनर्विवाह, पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण, पुनर्वास ठीक वैसे ही #पुनर्जन्म है.

चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति के कुछ श्लोकों द्वारा परलोक के सुख हेतु कुछ उपाय बताए हैं. यहाँ स्वामी जी ने परलोक और पुनर्जन्म दोनों को एक ही अर्थ में लिया है. मनुस्मृति के जो श्लोक उन्होंने उध्दृत किये हैं वे परलोक की सफलता पर केंद्रित हैं न कि आवागमनीय #पुनर्जन्म पर....

इस प्रकार गहन अध्ययन से स्वामी जी की धारणाओं और तथ्यों में प्रचुर विरोधाभास है. ऐसा प्रतीक होता है कि वेद विषयों पर स्वामी जी की जानकारी संदिग्ध थी.यही वजह है कि दयानंद जी की वेद भाष्यों पर भी संदेह होता है. दयानंद जी ने सायणाचार्य और महिधर मैक्समूलर के भाष्यों की ही नकल कर उसमें अपने निजी विचारों की मिलावट करी है.एक दर्जी जिस तरह अपने हिसाब से कपड़ों की कांटछांट करता है ठीक उसी तरह दयानंद जी भी वेदों के साथ किया है. उनकी भाष्यों में शब्दार्थ और भावार्थों में समानता नहीं है.Published from Blogger Prime Android App

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