सत्यार्थप्रकाश प्रक्षिप्त है..

#सत्यार्थप्रकाश_भी_प्रक्षिप्त_है●●●

    यह चार पन्ने की पत्रिका थी.धीरे धीरे मोटी हो गई.

       दयानंद की मृत्यु के पश्चात उनके तमाम पूर्वाग्रही शागिर्दों ने #सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद की शैली नकल कर अपनी दुराग्रह को जोड़ा है. दयानंद की मृत्यु के बाद अग्रवाल बंधुओं का आर्य समाज पर प्रभाव और एकाधिकार होता गया. और ब्रहमणवाद को कुचलने के लिए नीतियां और योजनाएं बनने लगीं.तात्कालिक और वर्तमान घटनाएं लोग जानते हैं. यहीं से आर्यसमाज असहिष्णु, असंयमी और असंसदीय होता गया.समीक्षा के नाम पर महापुरुषों, धर्म शास्त्रों, संप्रदायों पर आक्षेप,विरोध बढ़ता गया. और यह नारा भी बुलंद किया कि"आर्य समाज दौड़ता रहेगा तो हिंदू समाज चलता रहेगा, आर्य समाज चलता रहेगा तो हिंदू समाज बैठ जायेगा और आर्य समाज बैठ जायेगा तो हिंदू समाज सो जायेगा, आर्य समाज सो गया तो हिंदू समाज मर जायेगा"

           लाला लाजपतराय और तात्कालिक आर्य समाज पर अग्रवाल बंधुओं का एकाधिकार था.मालवीय आदि के समाज पर विचार उनसे मिलते थे आर्य समाज के प्रारंभिक सभासद दयानंद के कई सहयोगी अग्रवाल ही थे. मुंशी इंद्रमणि जिन्होंने आर्य समाज की ओर से इस्लाम खंडन पर पहला ग्रंथ"#इंद्रवज्रा"लिखा था और बाद में खुद ही आर्य समाज के विरोधी बने.

    #सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण सन् 1882में प्रकाशित किए गए. यहाँ सवाल यह पैदा होता है कि सन्1882में न तो देश के हालात बदले और न ही हुकूमत बदली फिर क्यों अंतिम दो समुल्लास जोड़े गए?

दूसरा सवाल यह है कि प्रकाशक की कौन सी व्यक्तिगत मजबूरियां थीं कि आधा अधूरा प्रकाशित किया गया.?आधा अधूरा प्रकाशित करना प्रकाशक हड़बड़ी दर्शाता है जैसे उसपर दबाव हो???यह औचित्य पूर्ण नहीं लगता. बाद के अध्याय संदेहास्पद हैं जिसे समाजी जाहिर करने से कतराते हैं.

      सत्यार्थ प्रकाश जोड़ने वाला नहीं नफरत,वैमनस्य फैलाने वाला और भड़काऊ ग्रंथ है.Published from Blogger Prime Android App

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