अंगूर खट्टे हैं.दयानंद कथित धर्म सुधारक..

मैंने आर्य मित्र के अनुरोध पर फिर से सत्यार्थ प्रकाश का लेटेस्ट संस्करण२००८ पढ़ा.पहले के संसकरणों की अपेक्षा इसमें तमाम एडिट और कट्स मिले. एक समानता दिखी....इसमें किये गए दावे .....कि इस ग्रंथ में मिथ्या अर्थों का खंडन और सत्यार्थ का प्रकाश है. इसके तर्क अकाट्य और सप्रमाण हैं.

       दयानंद जी ने इस ग्रंथ में सभी संप्रदायों को समाप्त कर एक मत-मतस्थ करने की कोशिश और उपाय सुझाये हैं जो अच्छी लगी.पर अतिमहत्वकांक्षा के चक्कर में वो अपनी दुराग्रह और पूर्वाग्रह भी नहीं छोड़ पाये कि उन्हें महर्षि कहा जा सके.

      प्रथम संस्करण जिसमें १० समुल्लास थे.हो सकता है कि उसमें उनकी समीक्षा और सत्यार्थ का प्रकाश हो.क्योंकि वे संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार माने जाते थे. वेदों और आर्ष ग्रंथों की मिलावट पकड़ सकते थे क्योंकि वेदों सहित तमाम आर्ष ग्रंथ उस समय संस्कृत में हुआ करते थे. तो ये माना जा सकता है कि उन्होंने इनकी मिलावट और अशुद्धियों को दूर करने का नेक प्रयास किया.

    पूर्वाद्ध के १०वें समुल्लास तक उनकी विद्वता झलकती है पर उत्तरार्द्ध के बाकी समुल्लासों में उनका अल्पज्ञान और संदिग्धज्ञान झलकता है.

"#असूर्या_नाम_ते_लोका_अंधेन्_तमसावृताः_तास्ते_प्रेत्यादि_गच्छन्ति_ये_के_चात्महनो_जना:।। "वाली ब्यवस्था से लोगों को मुक्त करते करते खुदी इस ब्यवस्था से उबर नहीं पाये. अल्पज्ञान के धुंध कोहरे में खुद गर्त तक धंसते गए. अब उनके अनुचर नई अलख सुलगा कर उस धुंधलके को मिटाने का यत्न भर कर रहे हैं. समाजी कभी ये नहीं बताते कि प्रथमावृति में कितने समुल्लास थे?आधे अधूरे प्रकाशित करने की क्या हड़बड़ी थी?बाकी के समुल्लास किन कारणों से नहीं जोड़े जा सके..।? उत्तरार्द्ध के जोड़े गए समुल्लास दयानंद जी की ही कृत्तियां हैं इस पर शंसय दूर नहीं कर पाये.

   जो जैसा है उसको ठीक वैसा ही कहना, लिखना, मानना सत्य है।पर उत्तरार्द्ध के समुल्लासों में पूर्वाग्रही समीक्षा को अंतिम सत्य मनवाने की बलात् कोशिश है. इस ग्रंथ में दयानंद जी को छोड़ बाकी को अविद्वान बताने का भरसक प्रयास भर है.Published from Blogger Prime Android App

     स्वामी दयानंद जी व्याकरण के गुरू और ज्ञानी थे लेकिन वह वेद के अज्ञानी थे। वह घोड़े का अर्थ परमेश्वर बताकर गए हैं।

उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि वैदिक यज्ञों में रानी द्वारा घोड़े से समागम करने वाले मंत्रों का अर्थ बदला जा सके।Published from Blogger Prime Android App

वास्तव में स्वामी जी वेद का वास्तविक अर्थ बताकर नहीं छिपाकर गए हैं।

देखिए;

इसलिए सत्य को अपने विवेक और स्वाध्याय से जानें.....किसी के ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य मानना स्वविवेक को मारना है. सत्य की ओर लौटें.

#एकबार_सभी_सत्यार्थप्रकाश_अवश्य_पढ़ें..

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