कृष्ण जी माखनचोर ही हैं.

#दयापंथियों के स्वामी हिंदुत्व ही ना समझ पाये!

फिर दयापंथी माखनचोर को कहाँ समझ पायेंगे.??

पौराणिक हिंदुओं में भ्रान्ति है. श्रीकृष्ण भगवान नहीं वेद विरोधी है पौराणिक एक तरफ श्रीकृष्ण को भगवान मानकर पूजते हैं तो दूसरी तरफ रास रचईय्या,माखनचोर वस्त्र चोर भी मानते हैं!!

        #दयापंथियों भगवान क्या रास भी नहीं रचा सकते हैं भक्तों भगतिनो के साथ???

यह पूरे संसार ही भगवान के रास के सिवाय कुछ नहीं है।जो इस तथ्य को समझ लेता है वह भगवान को समझ लेता है।

दागदार चरित्र जिनके होते हैं वे हमेशा दाग दाग करेंगे।भगवान का को चरित्र नहीं होता है।उनमें कोइ दाग नहीं लग सकता है।

माखन चुराने की घटना को अगर दयापंथी दाग समझते हैं तो यह उनके मंदबुद्धि को जाहिर करता है।

शायद वे मानसिक रूप से दीवालिया की तरह बातें करते हैं।

जिसके घर में भी बच्चे खेलते हँसते हैं उन्हें तो दयापंथियों की मंदबुद्धिता पर तरस और हँसी ही आएगी।

सभी बच्चे बाल्यावस्था में चोरी करते हैं(मूर्खों के अनुसार) क्योंकि बच्चे को अयं निजः का बोध कहाँ???माखन है बस खा लिया।कौन मटकी अपनी माँ का है कौन बगलवाली आंटी का है यह बोध बच्चों को होता है???माखनचोर नटखट नंदलाल यह तो कृष्ण के सुंदरत बालक होने का प्रमाण है।

युवावस्था किशोरावस्था में छेड़खानी प्यार मुहब्बत भी जीवन का अनिवार्य अंग है।नपुंसक ही ऐसा नहीं कर सकते।नियमों दुष्टताओं के कारागृह मेंं बंद  आज के लोग के लिए ये चरित्रहीनता लगता है।कृष्ण समय समाज इतना विकृत नहीं था।इसलिए वे कपरे चुरा सके छेड़खानी खरते रहे।और किसी लड़कियों ने मुकदमा नहीं किया।सभी उनके प्रेम की दीवानी थी।इंतज़ार में रह थी कब आओ कन्हैया कब मटकी फोरो कब कपरे चुराओ।

इसीलिए तो कृष्ण पूर्णावतार हैं।जीवन संपूर्ण रूप से उनमें व्याप्त है।वे योगीराज भी हैं और योद्धा भी।वे वंशीधर भी हैं गिरिधर भी।

वे धूर्तई करनेवाले अन्याय का साथी द्रोण भीष्म का गर्दन भी काट सकते हैं और सुदामा का पाँव भी पखार लेते हैं।

वे शिशुपाल के सौ अपराधों को हँसते हुए क्षमा कर देते हैं।और अति होने पर गर्दन भी उताड़ लेते हैं।

जिन्होंने बचपन किशोरावस्था में बालाओं के कपरे चुराए उन्होंने ही भरी सभ्य समाज के सभा में आततायी बूढे जवानों गुरुजनों के बीच नग्ण की जाती हुइ स्त्री को नग्ण होने से भी बचाए।और बड़े बड़े वेदज्ञ वीर धुरंधर उस स्त्री को नग्ण करने को आतुर थे।

कृष्ण बंधनरहित थे।

इसलिए उन्हें समझने के लिए विराट हृदय चाहिए।

कृष्ण के जीवन की हर घटनी अनुकरणीय अद्वितीय और प्राकृतिक है।

चरित्र पर दाग उन्हें दिखाई देता है जिन्हें स्वयं के जीवन का कोइ अनुभव नहीं है।Published from Blogger Prime Android App

   Osho Anant jiप्रणाम
Arya Veerangna जी कुछ तो समझ में आया होगा.?

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