अर्द्ध नास्तिक दयापंथी,नास्तिक और धर्म शास्त्र..

आज विज्ञान एवं तकनीकी के इस युग में धर्म शास्त्रों में कही गई बातें असंभव हैं.आज संसार में झूठ व आडम्बर का बोलबाला है, अतःतर्कवादियों को धर्म शास्त्रों की बातें गपोड़ लग सकती हैं.

 जो परिस्थितियाँ हमारे प्रत्यक्ष व अनुमान प्रमाण के परे होती हैं वे हमें असम्भव प्रतीत होती हैं.

            नास्तिक और अर्द्ध नास्तिक #दयापंथि ऐसी ही परिस्थितियों में धर्म शास्त्रों को गपोड़ बताने लगते हैं.

 शास्त्रों को मिथ्या गपोड़ मानने से पहले आइये संसार का दिग्दर्शन करें.उन्हीं शास्त्रों के अनुसार अभी कलियुग चल रहा है जिसमें, अन्य युगों की तुलना में, शारीरिक शक्ति न्यूनतम स्तर पर होती हैं तब भी हमारे भारत सहित विभिन्न देशों में असाधारण क्षमता रखने वाले लोग हैं. #बर्फीले_मनुष्य” के नाम से मशहूर विम होफ एक साहसी व्यक्ति ने -20 डिग्री फॉरेनहाइट (-29℃) में आर्कटिक वृत्त की मैराथन दौड़ नंगे (उघाड़े) बदन​ पूरी की.ऐसे ही कितनी ऐसी शख्सियतें हैं तो असाधारण क्षमता रखते हैं अतः आज भी कुछ मानवों में अतिमानवीय गुण मिलते हैं परंतु वे मानव दुर्लभ हैं. आज आधुनिक युग में वेट लिफ़टर तकरीबन​ 260 किलोग्राम वजन उठा सकते हैं परंतु सोलहवीं शताब्दी में भारतीय योद्धा महाराणा प्रताप 7 फीट 5 इंच लंबे थे.वे 300 किलोग्राम वजन की तलवार, भाला तथा कवच पहनकर घोड़े पर सवार होकर​ युद्ध किया करते थे.

 यह संसार परिवर्तनशील है.सतयुग में मनुष्यों में अधिकतम आध्यात्मिक तथा शारीरिक शक्तियां थी, जो कि समय के साथ-साथ धीरे-धीरे घटती जा रही हैं और कलियुग के अंत में न्यूनतम स्तर पर होंगी.यह भी शास्त्रों में है.अतः धर्म शास्त्रों में वर्णित पूर्व युगों में घटित वृतांत आज हमें अविश्वसनीय तथा असंभव लगते हैं.

        सात्विक​ शक्तियों की अपेक्षा कलियुग में कुछ लोग तामसी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं उन लोगों को तांत्रिक कहते हैं इन की प्रवृत्ति राक्षसी  होती है.अतः ये लोग भूत प्रेतों की सिद्धियाँ करके  तामसी शक्तियों का प्रयोग करते हैं.

       जबकि पूर्व युगों में, मुख्यतः सतयुग में, सत्व गुणों की प्रधानता थी अतः तब​ के लोग देवी देवताओं को प्रसन्न कर के दिव्य शक्तियों को व सात्विक सिद्धियों को प्राप्त कर लेते थे तथापि उनका मनमाना उपयोग करते थे. उदाहरणार्थ सतयुग में ..

◆हिरण्यकश्यपु ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके विष्णु जी को ही समाप्त करने की इच्छा कर ली.

◆अर्जुन ने शिव जी को प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र प्राप्त कर लिया Published from Blogger Prime Android App

◆कुंती ने ऋषि को खुश करके देवताओं को आह्वान करने का मंत्र पाया

◆रामायण काल में मायावी राक्षस हुआ करते थे.

◆आठ माह के भ्रूण का बिना शल्य चिकित्सा के रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरण आदि अवैज्ञानिक और गपोड़ लग सकती है.Published from Blogger Prime Android App

महान वैज्ञानिक जैसे जॉर्ज स्टीफनसन, न्यूटन, आइंस्टीन आदि ने अपने सिद्धांतों को प्रतिपादित किया.उनके बाद आने वाले वैज्ञानिकों ने उनके सिद्धांतों को सत्य मानकर उससे आगे नए प्रयोग किए और नए आविष्कार कर दिए.यदि वे पूर्व के वैज्ञानिकों के सिद्धांत को नींव न मानकर प्रारंभ से सिद्धांत की खोज करते तो नए आविष्कार कभी नहीं हो पाते.

       उसी प्रकार​,धर्म शास्त्रों की बातें भी प्रामाणिक हैं  इनका प्राकट्य​ भगवत प्राप्त संतो के द्वारा हुआ है.संत त्रिकालदर्शी थे अर्थात​ किसी के भी भूत वर्तमान तथा भविष्य को जान सकते थे.उनके आशीर्वाद तथा श्राप फलित​ होते थे, उनके पास ऐसी शक्तियाँ होती थीं कि वे जो भी निश्चय करते थे वह तुरंत हो जाता था.हम अपने वर्तमान आध्यात्मिक स्तर से उस स्तर की आध्यात्मिक शक्ति एवं ज्ञान की कल्पना तक करने में सम्भवतः असक्षम हैं.अतः उन​ ऋषि-मुनियों द्वारा प्रणीत ग्रंथों का अनुभवात्मक ज्ञान​ बिना साधना किये वर्तमान में हमें कैसे हो सकता है ?

      ऐसे में प्रक्षिप्त, मिलावट,अप्रमाणिक कुतर्क गपोड़ बताकर आध्यात्मिक विज्ञान को भौतिक विज्ञान के साथ तुलना करना उचित नहीं है.

    आध्यात्मिक तथ्यों को भौतिक विज्ञान के बटखरे से तौलना ठीक नहीं है.

होना ये चाहिए कि धर्म शास्त्रों की बातों तथ्यों पर शोध हो.धर्म शास्त्रों में कही गई बातें डिकोड हों जो आज हो भी रहा है.

       सिरे से खारिज करके भौतिक वैज्ञानिक आधार पर धर्म शास्त्रों की काँटछाँट जोड़तोड़ ना हो.जो #दयापंथि कर रहे हैं.

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