परमेश्वर एक है तो अलग अलग ईश्वरों के लिए झगड़े क्यों??

पर्यावरण और इंसानी सभ्यता का संबंध सदियों पुराना रहा है. प्राचीन काल में हम बह्मांड के पंचतत्वों को ही भगवान मानते थे.

  भ से भुमि

ग से गगन

व से वायु

अ से अग्नि और 

न से नीर..

इन्हीं पंच महाभूतों से हम सब और सार जीव जगत बना है. भगवान को किसी मंदिर, मस्जिद या गिरजे में कैद नहीं किया जा सकता.वह तो हमारे शरीर में ही है.हममें है.जबतक यह ज्ञान था सब ठीक था.

       जटिलताएं तब आईं जब हमारा भरोसा हमसे ही उठ गया. हमें गलतफहमी हो गई कि भगवान हमसे कहीं दूर रहता है. हमने उसे मंदिरों के गर्भ गृह में, मस्जिदों और गिरजों में ताले जड़कर कैद लिया. यह हमारी गलतफहमी ही थी और है भी.

            हम डरे डरे, सहमे हुए और दबे दबे रहने लगे.भगवान को हमसे अलग मानने लगे,डर की पूजा करने लगे,नदियों, पर्वतों, पत्थरों, पेड़ों, महापुरुषों को ही भगवान समझने की भूल करते रहे.

        वेद शास्त्र, कुरान और बाईबल एकेश्वर का ही जिक्र करते हैं.

    परमेश्वर एक ही है जो पंचभूतों और सारी सृष्टि का कर्ता है.विभिन्न धर्म शास्त्रों में चंद मतभेदों को छोड़ दिया जाये तो समानताएं ज्यादा हैं.

      राम,कृष्ण,बुद्ध और ईसा ने उसी एक परमेश्वर तक पहुंचने का मार्ग सुझाया है. जिसको जो मार्ग सीधा लगे वो उसी मार्ग का राही होकर ईश्वर प्राप्ति का यत्न करे.

        सबका एक ही लक्ष्य है ईश्वर प्राप्ति. राहें अलग अलग हो सकती हैं. मगर एकदूसरे का विरोध कहाँ तक जायज है.?राम,कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, कबीर,मुहम्मद ने एक दूसरे का विरोध कभी नहीं किया. ये सभी उसी एक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते रहे.

          लेकिन इंसान आज विषाद, नफरत,असहिष्णुता की अंधेरी गुफाओं में टटोल रहे हैं. उनके जीवन में रोशनी नहीं है.हम असत्य से सत्य की ओर और अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की प्रार्थना दोहराते रहे और रोशनी से ही दूर भागने लगे. अंधे अंधों के पथ प्रदर्शक बने बैठे हैं.खुद की आँखों में लट्ठे पड़े हैं और दूसरे की आंखों के तिनके कैसे निकाल पायेंगे??

  ये खुद तो गिरेंगे ही साथ में दूसरों को भी गिरायेंगे.एकदूसरे का विरोध और निंदा कतई ठीक नहीं.Published from Blogger Prime Android App

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