कहे कबीर दीवाना●●●

#कहे_कबीर_दीवाना●●●

              ब्राहमण डरता है अगर क्षत्रिय ज्ञानी हो जाए तो उसके पास जाने से। क्षत्रिय डरता है अगर वैश्य ज्ञानी हो जाए, उसके पास जाने से। वैश्य डरता है अगर .शूद्र ज्ञानी हो जाए, उसके पास जाने से।

       *चमार रैदास के पास कोई भी न गया। सेना नाई के पास कोई भी न गया। जुलाहे कबीर के पास कोई भी न गया। वे आखिरी हैं। उनके पास ऊंची श्रेणी के लोग भयभीत होते हैं।*

स्वभावत: वे ही लोग गये, जो उसी श्रेणी के थे। इसलिए कबीर को मानने वालों की संख्या निम्न वर्ग के लोगों में मिलेगी। निम्नवर्ग के लोगों के पास न तो धन है, न पद है, न प्रतिष्ठा है। वे किसी को ऊपर आकाश में उठाना भी चाहें तो नहीं उठा सकते। सच तो यह है, उन के कारण ही

कोई आकाश में हो तो वह भी जमीन पर उतर आएगा।

उनके पास कुछ भी तो नहीं है। *इसलिए कबीर को माननेवाले कबीर को तो ऊपर नहीं उठा सके। कैसे उठाते? कोई उपाय न था। कोई सीढ़ियां न थीं उनके पास। बल्कि उनके मानने के कारण —चमार, भंगी, शूद्र और हरिजन कबीर को मानने लगे; उस कारण और भी अड़चन हो गई पंडित को, ब्राहमण को, क्षत्रिय को, वैश्य को आने की।*


           ऐसा हुआ कि *मैं एक गांव में था। और वहां रैदास की जयंती मनाई जा रही थी। रैदास तो चमार थे। गांव के चमार मेरे पास आ गए और बोले कि आप भी चलें और रैदास पर दो शब्द कह दें। मैं राजी हो गया। मैं जिनके घर में मेहमान था, वे बड़ी मुश्किल में पड़ गये, जैन घर था, बड़े सम्पन्न व्यक्ति थे। उनको जरा बेचैनी मालूम होने लगी।*


      सांझ को उन्होंने मुझसे कहा ऐसा है कि मुझे जरूरी काम है। अच्छा तो नहीं मालूम पड़ता कि आपको अकेला भेजूं — क्योंकि चमारों की सभा! अब उसमें गाव का प्रतिष्ठित श्रेष्ठ, नगरसेठ, वह कैसे जाए चमारों की सभा में? और मैं तो कल चला जाऊंगा और यह झंझट सदा के लिए पीछे बंध जाएगी, कि चमारों की सभा में गए थे।

तो उन्होंने कहा, 'मुझे जरा जरूरी काम आ गया है। आना तो आपके साथ था। '

मैंने कहा, ' आप बिलकुल फिक्र न करें। जरूरी काम मुझे पता है, नहीं आया है, मगर कोई चिंता की बात नहीं, मैं अकेला ही जाऊंगा। आपको आने की कोई आवश्यकता भी नहीं। '

'नहीं ', उन्होंने कहा, ' आप बुरा न मानें। आप ठीक कहते हैं, कोई काम नहीं आया है। आप से क्या झूठ बोलना! लेकिन डर लगता है चमारों की सभा — और आप भी न जाते तो अच्छा था।


        *मैंने कहा, ' मैं तो जाऊंगा। किसी और की होती तो मना भी कर देता। चमार आए, उनको मना करना भी ठीक नहीं। कोई जाने को राजी भी नहीं है। '*


          *सेठ तो गए नहीं, वह तो ठीक ही है; ड्राइवर भी मुझे छोड्कर दूर गाड़ी खड़ी करके अपनी कार में बैठा रहा। कोई घर से मेरे साथ न गया। और सब जगह जाने से मेरे साथ प्रतिष्ठा मिलती थी। जहां भी जाते, मंच पर बैठते। चमारों की सभा में मंच पर भी बैठने में डर! ड्राइवर भी मेरे पास नहीं खड़ा रहा। वह भी दूर कार खड़ी करके खड़ा रहा। मैंने उससे पूछा, तू सुनने नहीं आया? तू हमेशा गाड़ी बंद करके और सभा में आकर बैठता है। बोला, 'चमारों में बैठना ठीक नहीं।*  फिर जो सेठ ने किया —सेठ क्यों नहीं आये आपको पता है? वही कारण मेरा भी है। मैं ब्राहमण हूं। सेठ तो वैश्य हैं। अगर वैश्य नहीं आ सकता, तो मैं तो ब्राहमण हूं। और ब्राहमण भी कोई साधारण नहीं, कान्यकुब्ज ब्राहमण हूं। '

पागलों की दुनिया है। तरह —तरह के पागल हैं—कान्यकुब्ज, देशस्थ, कोंकणस्थ —तरह —तरह के पागल हैं। 


          *चमारों की सभा में कौन जाए! चमार बड़े प्रसन्न हुए, बड़े आनन्दित हुए। उन्होंने कहा हम सदा बुलाते हैं, निमंत्रण देते हैं। कोई आता ही नहीं।*

कबीर के पास कौन जाए?


         *जबलपुर में जहां मैं रहता था वर्षों तक, वहां नाई 'सेन उत्सव' मनाते हैं सेना नाई का। कोई जाने को राजी नहीं। मैं जब बोलता था तो मुझे कोई दस हजार, पन्द्रह हजार लोग सुनने आते थे। यह सोच कर सेना के भक्तों ने सोचा, कि अगर मैं बोलूं सेना नाई पर तो दस —पन्द्रह हजार आदमी सुनने आएंगे। सेना नाई की बड़ी ख्याति होगी। मैंने उनको कहा, ' तुम गलती में हो। वे जो मुझे सुनने आते हैं दस —पन्द्रह हजार लोग वे जब मैं तुम्हारे सेना नाई पर बोलूंगा तो नहीं आएंगे। '*


          उन्होंने कहा, 'आप बात छोड़िए। वे आपको प्रेम करते हैं, सेना नाई से क्या लेना —देना? आप जिस पर भी बोलते हैं, वे सुनने आते हैं। गीता पर बोलते हैं, तो सुनने आते हैं, महावीर पर बोलते हैं तो सुनने आते हैं, बुद्ध पर बोलते हैं तो सुनने आते हैं। '


         मैंने कहा, ' वह ठीक है। बुद्ध, महावीर, कृष्ण, वह सभी सवर्णों की दुनिया है। मगर तुम नहीं मानते तो मैं आऊगा।

            *मैं गया। कोई नहीं आया। पन्द्रह हजार तो दूर, पन्द्रह चेहरे न दिखे मुझे, जिनको मैं पहचानता था। सिर्फ नाई दिखाई पड़े। और बेचारे बड़ी राह देखते रहे, कि कोई आए। बस, पंद्रह —बीस! वह भी एक नाईबाड़े के सामने उन्होंने मुझे बिठा दिया। उन्होंने बड़ी आशा की थी, बड़ा इंतजाम किया था, पंडाल बिछाया था, लगाया था —कोई नहीं आया!*


       *मैंने उनसे कहा, वे नहीं आएंगे। सेना नाई पर मुझे सुनने नहीं आ सकते तो सेना नाई के पास तो कैसे गये होंगे? असंभव।*


        *और भारत तो बहुत ही ज्यादा अहंकारी मुल्क है। तुम कहते इसको धार्मिक हो, यह धार्मिक है नहीं। इससे ज्यादा अहंकारी समाज खोजना ससार में कठिन है।*


        मैं तुमसे कहता हू भारत के बाहर ही यह घटना घटी है, जिनको तुम धार्मिक नहीं कहते।


         *जीसस बढ़ई थे, फिर भी ' ईश्वर के पुत्र ' की घोषणा हो सकी। मुहम्मद किसी बहुत ऊंचे वर्ण से नहीं आते थे। भेड़ों को चराने और भेड़ों के बाल काटने का धंधा करते थे, फिर भी पैगंबर हो सके। भारत के बाहर ही यह अनूठी घटना घटी है कि मुहम्मद जैसा अपढ़, गरीब, —शूद्र वर्ग से संबंधित, जीसस जैसा अपढ़ गरीब —शूद्र वर्ग से संबंधित व्यक्ति जीवन के उच्चतम शिखर पर विराजमान हो सका है।*


         *भारत तो बहुत अहंकारी है। अगर यहां क्राइस्ट पैदा होते भूल से, तो उनकी वही गति होती, जो कबीर की हुई है। अगर यहीं मुहम्मद पैदा हो जाते तो वही गति होती, जो कबीर की हुई; कोई फर्क न पड़ता।*


        भारत बहुत अहंकारी है। यहां धर्म भी अहंकार का हिस्सा हो गया है। और धार्मिक अहंकार!

पवित्र अहंकार और भी खतरनाक हो जाता है —पवित्र जहर जैसा खतरनाक क्योंकि जहर में अगर थोड़ा कुछ और मिला हो तो जहर जरा कम जहरीला हो जाता है।

मुल्ला नसरुद्दीन मरना चाहता था। तो बाजार गया, जहर खरीद लिया, रात को खाकर सो गया। कई बार उठ —उठ कर देखा, अभी तक मरे नहीं? सुबह भी हो गई। आंखें बद किए थोड़ी देर पड़ा रहा, कि .शायद मर गए हों। दूधवाले की आवाज सुनाई पड़ने लगी, घर के बरतन — भाण्डे बजने लगे —क्या मामला है? आख खोलकर देखा, सब वैसे ही है, मरे नहीं। सोचता था, —शायद नर्क में पहुंचे कि स्वर्ग में—क्या हुआ? लेकिन मरे ही नहीं!

भागा हुआ दुकान पर पहुंचा जहर के और कहा ' हद हो गई! तुमने धोखा दिया। 'उसने कहा, ' भई, मैं भी क्या कर सकता हूं? सभी चीजों में मेल चल रहा है।  *' जहर भी —शुद्ध कहा है आज? दूध ही अशुद्ध नहीं मिल रहा, जहर भी अशुद्ध है। उसको भी खाकर पक्का भरोसा नहीं कर सकते, कि मर ही जाओगे।*


       शुद्ध जहर तो बहुत खतरनाक हो जाता है। *धार्मिक व्यक्ति का अहंकार .शुद्ध जहर है।* उसमें से सब अशुद्धि बाहर निकाल दी गई। धनी आदमी के अहंकार में थोड़ी अशुद्धि है। वह अशुद्धि यह है, कि धन खो जाए तो अहंकार को गिरना पड़ेगा। पहलवान के अहंकार में थोड़ी अशुद्धि है, .शरीर कल बीमार पड़ जाए— और पहलवान अक्सर बीमार पड़ते हैं। भयंकर बीमारियों से मरते हैं। क्योंकि पहलवानी .शरीर के साथ ज्यादती है। वह अप्राकृतिक है। इसलिए गामा हो, कि कोई भी हो, कैन्सर, क्षयरोग, खतरनाक बीमारियों से मरते हैं —मरेंगे ही। क्योंकि .शरीर के साथ जबरदस्ती कर रहे हैं। पहलवानी कोई स्वास्थ्य नहीं है।

तो एक दिन शरीर मरेगा, टूटेगा, खराब होगा; तब अकड़ चली जाएगी। आज पद पर हो, मिनिस्टर हो कि चीफ मिनिस्टर हो, कल नहीं रहोगे। फिर भीख मांगते वोट की फिरोगे। इसलिए वह अकड़ भी —शुद्ध नहीं है।

लेकिन धार्मिक आदमी की अकड़ बिलकुल .शुद्ध है। उसको तुम छीन नहीं सकते। वह चरित्रवान है। चरित्र को कैसे छीनोगे? वह राम —चदरिया ओढ़ता है, राम —राम जपता है; उसको कैसे छीनोगे? वह मंदिर जाता है, पूजा—प्रार्थना करता है, यज्ञ—हवन करता है; उसको कैसे. छीनोगे? उसका अहंकार छीनना मुश्किल।


           *भारत महा — अहंकारी है। उसने अपने अहंकार को बड़े आभूषणों से सजा लिया है। और इसलिए बहुत से परम—ज्ञानियों से देश लाभ लेने से वंचित रह गया।बहुत पैदा हुए हैं इस मुल्क में, जिन्होंने परम सत्य को जाना है। इसलिए मैं एक तरफ उपनिषदों पर बोल रहा हूं कृष्ण पर बोल रहा हूं लेकिन कबीर को भूलता नहीं। बीच —बीच में कबीर को भी ले आता हूं। किसी तरह राजपुत्रों को और शूद्रों को करीब लाना है। किसी तरह सिंहासन और भिखारी को पास लाना है।* ताकि हम यह समझ सकें, कि सत्य को पाने का कोई भी संबंध न तो जाति से है, न वर्ण से है, न धर्म से है, न कुल से है, न गोत्र से है। सभी के लिए खला आकाश है सत्य का। जो भी आने को राजी है, उसका ही स्वागत


आज इतना ही।Published from Blogger Prime Android App

~ओशो.[ कहे कबीर दीवाना.प्रवचन-12 ]

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