दयानंद और अंतिम सत्य..

#दयानंद और अंतिम सत्य....।।

   ...मूलशंकर तिवारी(दयानंद सरस्वती)इस भ्रांति में जीते रहे कि वह हिंदुत्व का भला कर रहे हैं, दरअसल उन्हें खुद हिदुत्व की पूरी समझ नहीं थी. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि वे हिंदुत्व को केवल सतही, सरसरी तौर पर ही देखा था. उन्हें हिंदुत्व के पूजन विधान और कर्मकांड निरा दोषपूर्ण और पाखंड लगा.समाज सुधार की अपरिपक्व उत्तेजना में उन्हें भ्रम हो गया कि जिस बुनियाद पर हजारों वर्षों से हिंदुत्व टिका है,उसे अपने निजी कथित वैज्ञानिक विचारों से झटके भर में धता बताकर क्रांति लाने का प्रयोग किया. वे वेदों और तमाम ग्रंथों को अवैज्ञानिक करारते हुए उनमें अपने निजी विचारों की मिलावट कर उसे ही अंतिम सत्य या आर्षग्रंथ बताकर हिंदुत्व के ऊंचे आदर्शों को बौना करने का काम किया..

                ईसाईयत और इस्लाम के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता को रोकने के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना कर अपनी महत्वकांक्षा के लिए हिंदुत्व को ही कमजोर और पाखंड बताकर शास्त्रार्थ और सभाएँ आयोजित कर खुद को स्वघोष विद्वान करने का प्रयोग किया. इसी उतावलेपन में वे अन्यान्य पंथों, मंतों,संप्रदायों की भी कथित समीक्षाएँ प्रायोजित शास्त्रार्थियों से की.

         सन् 1880 के बाद दयानंदी कुनबे ने जैसे दर्जी कपड़ा अपनी सहुलियत के हिसाब से काटता है उसी तरह तमाम शास्त्रों की भी कांट छांट और संशोधन किया. जिसे हिंदू समाज आज भी अश्रद्धेय मानता है.

  दयानंद ने फिर सनातनियों के समाजियों में कन्वर्जन के लिए उनके मन में यह बात भर देना चाहते थे कि आज का हिंदू धर्म, वैदिक धर्म के पूर्णतया विपरीत है और जब यह बात हिंदुओं के मन में बैठ जायेगी तो वे तुरंत हिंदुत्व का त्याग कर देंगे. पर ऐसा होता ना देखकर वे ईसाईयत और इस्लाम को कोसना शूरु किया. ऐसी स्थिति में हिन्दू समाज खुद को चौराहे में पाकर विकल्प की तलाश में ईसाईयत की ओर झुकने लगा.महर्षि बौखलाहट में अब खुलकर निंदा विरोध करने लगे.आज उनके अनुचर कोसने, आक्षेप करने,निंदा करने, विरोध करने, गालियां करने को ही अपनी श्रेष्ठता और विद्वता समझते हैं.

        दयानंद ने अपनी असफल प्रयोगों से निराश होकर "सत्यार्थ प्रकाश"नामक किताब लाया. जिसे उनके अनुचर अंतिम सत्य मानकर गलौच,दुराग्रह, निंदा, आक्षेप के बल पर लोगों को वेदों की ओर लौटने का आह्वान करते नजर आते हैं. यही उनकी श्रेष्ठता है, विद्वता है....Published from Blogger Prime Android App

Comments

  1. सत्यार्थ प्रकाश ज्ञान का अंतिम सत्य नहीं है एक शुरुआत हुई

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