आर्य येपेत के वंशज हैं..


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दरअसल आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठता का सूचक है आर्य येपेत वंशजी हैं. चालाकी से बाद में निवर्तमान में इसे कर्म आधारित पदवी बताया गया..

आर्य नूह पुत्र येपेत के वंशज हैं. ये बड़े शूरवीर, ज्योतिष विद्या के धनी जिज्ञासु और प्रकृति के करीब रहकर प्राकृतिक घटनाओं, खगोलीय घटनाओं की पड़ताल करनेवाले बड़े जुझारू प्रवृत्तियों के लोग थे. उत्तम किस्म के घोड़े और खच्चर पालना इनका व्यवसाय हुआ करता था.इनकी कद काठी बड़ी डील डौल और रंग गेहुंआ होता था.इनका संबंध मादियों(medos) फारसियों, यूनानियों से था.

       खोजी प्रवृत्ति के होने के कारण ये जलमार्गों की खोज कर नए नए द्वीपों में सपरिवार जाकर जंगलों की सफाई कर पशुपालन के लिए बस जाते थे. वास्कोडिगामा, सिकंदर महान और तमाम यूनानी दार्शनिक गलीलियो आदि येपेत के वंशज ही थे.

        ये एकेश्वरवादी मूर्ति और प्रकृति पूजा के खिलाफ थे.यहूदी और फारसी श्रुत प्रार्थनाओं को अपने आध्यात्म में इस्तेमाल करते थे. बाद में इन्हीं प्रार्थनाओं में कुछ ब्यक्तिगत याचनाओं,कामनाओं,ऋषियों के साधना अनुभवों, आयुर्ज्ञान,नक्षत्र ज्ञानादि को संग्रह कर भारतीय महाद्वीप के दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों में बसकर दार्शनिकों,विद्वानों की निगरानी में देवनागरी लिपि में लिपीबद्ध किया गया. इसी प्रार्थना संग्रह की ग्रंथ को वेद कहा गया. पहले ऋगवेद की रचना हुई. इसमें हवा,पानी, आग,नक्षत्रों इत्यादि को देवताओं में गिना गया. बाद में विभिन्न तथ्यों, अनुभवों,आग्रह,चेतावनी,बनस्पति औषधियों के प्रयोग, ग्रहों नक्षत्रों की स्थितियों,औषधियों के प्रयोग लौकिक व्यवहारिक ज्ञान को इसमें शामिल कर" सामवेद"यजुर्वेद, अथर्ववेद आदि तैयार की गई है.

        इन वेदों में सभोपदेश,नीतिवचन, भजनसंहिंता आदि का प्रभाव है. जो तोरैत,बाईबिल में भी #जेन्द_अवेस्ता की अधिकतर बातें ऋगवेद में हैं. गुरूकुलों में इन्हीं ज्ञानों पर प्रयोग, अभ्यास और कुलीन उच्च जातीय परिवार के कुमारों के बीच साझा किया जाता था,रटाया जाता था.

        आर्य जहाँ जहाँ भी जाते वहाँ उनका सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रभाव पड़ता था. कालांतर में दयानंद जी ने वेदों की वैज्ञानिक तथ्यों और प्रमाणों के अनुसार संशोधन और भाष्यांतर ठीक करने का प्रयास किया.धार्मिक और आध्यात्मिक बातों को विज्ञान सम्मत बताने और भारतीय प्रायद्वीप के धार्मिक अनुष्ठानों को पाखंड बताकर आर्य समाज की स्थापना की.दयानंद #थियोसोफिकल_सोसायटी के साथ गठबंधन कर #आर्य_समाज_ऑफ_थियोसोफिकल_सोसायटी चलाया तभी से समाज में नास्तिकता की ओर रुझान बढ़ता गया. कुछ और कथित बुद्धजीवी इस संस्था में जुड़ते चले गए.अब समाज इल्यूमिनाती,ट्राईलेटरल कमीशन, दी यूनाईटेड नेशंस, जैसी संस्थाओं के प्रभाव में आकर 'एक विश्व व्यवस्था"नीति पर तमाम मतों,.. पंथों, धर्मों,आस्थाओं पर शास्त्रार्थ और समीक्षा गोष्ठियां आयोजित कर वेद प्रचार कम बुराई निकालना, निंदा करना,दुराग्रह लिखने पर ज्यादा काम करने लगे हैं. दयानंद ने #सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में भी यह जाहिर किया था कि संपूर्ण विश्व में एक मत धारणा सभी धर्म शास्त्रों से लेकर स्थापित हो.ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य बताने का प्रयोग शुरू हुआ.अब दयानंद के शागिर्द #दयापंथी उसी परंपरा के वाहक हैं.वेद प्रचार के नाम पर गाली गलौज अब ट्रेंड बना हुआ है.Published from Blogger Prime Android App

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