धर्म क्या है??

#सच्चा_धर्म◆◆◆

धर्म मनुष्य का मूलभूत स्वभाव है. लेकिन आमतौर पर लोग धर्म के अर्थ को लेकर दिग्भ्रमित होते हैं. दरअसल वे धर्म को एक खास चश्मे से, अपनी विशिष्ट धारणा के वशीभूत होकर देखते हैं....

         लेकिन धर्म का अर्थ कोई विशिष्ट परंपरा या संप्रदाय नहीं है और ना यह धारण करने वाली कोई वस्तु है कि धारण कर लिया या उतार दिया या फिर बदल दिया.

      इसका संबंध किसी विशिष्ट पूजा पद्धति या प्रणाली अथवा किसी विशिष्ट दर्शनशास्त्र से भी नहीं है.

        धर्म का सीधा अर्थ है जो जैसा है उसको वैसा ही खोजना, उसको जानना उसे व्यवहार करना है. इसे हम धर्म यात्रा कहते हैं. धर्म एक सीढ़ी है जिसपर निरंतर चढ़ते हुए व्यक्ति ऊँचा उठते जाता है,आत्मोन्नति करता जाता है.

       धर्म आस्था नहीं है क्योंकि आस्था कभी भी अनास्था में बदल सकती है. धर्म कभी बदलता नहीं है ना ही इसे कोई बदल सकता है. यह परिवर्तनीय नहीं है.

         धर्म विश्वास भी नहीं है क्योंकि यह भी बदल सकता है.

सत्य सदैव समरस एकरस होता है जो बदलता नहीं है. इसी सत्य की खोज में नेकी करते जाना धर्म है.

      दया,क्षमा, प्रेम और परोपकार धर्म की बुनियाद है.Published from Blogger Prime Android AppPublished from Blogger Prime Android App

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