दयानंद की कमअक्ली.. मूर्ति पूजकों को दयानंद व्याविचारी क्यों बताते हैं??

मूर्ति पूजा प्रतीक मात्र है इसके त्राटक ध्यान से मन को एकाग्र किया जाता है जैसे किसी बच्चे को आम के बारे में कुछ बताना या समझाना हो तो उसे आम या उसका चित्र दिखाना पड़ता है ठीक उसी तरह मूर्ति पूजा अध्यात्म विग्यान का प्रथम चरण है यह पहली कक्षा है.अध्यात्म के अगले चरण अर्थात उच्च कक्षा में प्रवेश करने पर मूर्ति की आवश्यकता नहीं रह जाती ध्यान में मूर्ति अर्थात ईष्ट अर्थात लक्ष्य, उसके आदर्शों या सद्गुणों के समुच्चय पर मन केन्द्रित होने लगता है.

              कथित महा ऋषि पहली जमात के विद्यार्थियों को महाविद्यालय के लेक्चर करने निकलते थे. वहाँ भी वो तोड़मरोड़ पढ़ाते!!!

और विद्यार्थियों को मूर्ख,जाहिल,अनपढ बताते फिरते थे.स्वामी जी चूहे लड्डू के चलते गणेशजी या शिवजी की भक्ति छोड़ दिये.क्योंकि उनका तर्क था कि जो शिव गणेशजी अपनी लड्डू की रक्षा नहीं कर सके वे हमारी रक्षा कैसे करेंगे???

तर्क तो बुद्धिसंगत है...

लेकिन ये जो हवन यज्ञ में मंत्र पढे़ उसपर उन्होंने तर्क किया???

अब ये देवताओं से हवन के समय प्रार्थना मंत्र जपते हैं कि हे फलाँ देव आओ सोमरस पीओ.और हमारे लिए पुत्र और धन सुख वैभव प्रदान करो!! 

शत्रुओं से हमारी रक्षा करो..

तो इस हवनकर्म के बाद दयाजी को कितने पुत्र हुए???

कितने धन देवताओं ने दिये???वे तो दरिद्र परिवार में जन्मे और दरिद्र ही रहे अंत तक???यहां हवन तो धन पुत्रादि की कामनाओं से कर रहे थे???

कितने शत्रुओं से पिटते वक्त उनकी रक्षा देवताओं ने किये??हर सभा में हिंदू सनातन पंडितों ने उन्हें हूट किया कूट दिया.आखिर में जहर देकर मार डाला.उनके उत्तराधिकारी श्रद्धानंदजी की भी हत्या किसी ने कर दिया???तो ये देवतागण जिनके लिए हवनकर्म करते हुए रक्षा की कामना करते थे वे देवता कहाँ चले गए जब उन्हें जहर दिया गया???

यहां भी तो तर्क होना चाहिए कि इतना हवन यज्ञ वेद प्रचार के बाद भी देवताओं ने हवनकर्मी की रक्षा नहीं किये तो ये वेद बकवास मंत्र यज्ञ हवन से कुछ नहीं होगा???यहां उनका तर्क कहाँ गया???

                         दयानंद को पढ़ें 

(प्रश्न) होम से क्या उपकार होता है?

(उत्तर) सब लोग जानते हैं कि दुर्गन्धयुक्त वायु और जल से रोग, रोग से प्राणियों को दुःख और सुगन्धित वायु तथा जल से आरोग्य और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है।

(प्रश्न) चन्दनादि घिस के किसी को लगावे वा घृतादि खाने को देवे तो बड़ा उपकार हो। अग्नि में डाल के व्यर्थ नष्ट करना बुद्धिमानों का काम नहीं।

(उत्तर) जो तुम पदार्थविद्या जानते तो कभी ऐसी बात न कहते। क्योंकि किसी द्रव्य का अभाव नहीं होता। देखो! जहां होम होता है वहां से दूर देश में स्थित पुरुष के नासिका से सुगन्ध का ग्रहण होता है वैसे दुर्गन्ध का भी। इतने ही से समझ लो कि अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म हो के फैल के वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गन्ध की निवृत्ति करता है।

(प्रश्न) जब ऐसा ही है तो केशर, कस्तूरी, सुगन्धित पुष्प और अतर आदि के घर में रखने से सुगन्धित वायु होकर सुखकारक होगा।

(उत्तर) उस सुगन्ध का वह सामर्थ्य नहीं है कि गृहस्थ वायु को बाहर निकाल कर शुद्ध वायु को प्रवेश करा सके क्योंकि उस में भेदक शक्ति नहीं है और अग्नि ही का सामर्थ्य है कि उस वायु और दुर्गन्धयुक्त पदार्थों को छिन्न-भिन्न और हल्का करके बाहर निकाल कर पवित्र वायु को प्रवेश करा देता है।

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   महर्षि जी मने होम हवन दुर्गंध दूर करने के लिए ही होता है.

   इसका इसके अलावा कोई दूसरा प्रयोजन नहीं है.????

😉म्युनिसिपैलिटी के सारे कर्मचारियों को हवनकर्मी बना दिया जाये!??

       😁गटर के आसपास क्षेत्रों में हवनकुण्ड बनवाये जायें!?

😆दिल्ली की वायुप्रदूषण दूर करने के हवनकर्मियों को ठेका दे दिया जाये??

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(प्रश्न) तो मन्त्र पढ़ के होम करने का क्या प्रयोजन है?

(उत्तर) मन्त्रों में वह व्याख्यान है कि जिससे होम करने में लाभ विदित हो जायें और मन्त्रों की आवृत्ति होने से कण्ठस्थ रहें। वेदपुस्तकों का पठन-पाठन और रक्षा भी होवे।

 मने मंत्रोच्चार मात्र आडंबर है!??

     #महर्षि जी बिना मंत्रोच्चार के ही हवन कुण्ड में हवनसामग्री झोंक दें तब भी लाभ है??

  मंत्रोच्चार आडंबर है तो रटने कण्ठस्थ करने का क्या लाभ है. ?

बगैर मंत्रोच्चार के होम से लाभ होगा या नहीं??🤔🤔🤔

लोगों को इतना भर मालूम हो आम लकड़ियां इकट्ठी करो घी अनाज कपूर चंदन भट्ठी में झोंक दो दुर्गंध दूर हो जायेगी.वायुप्रदूषण दूर हो जायेगा.

मंत्र इसीलिए रटो कि वेद मिट ना जाये.!!!😊

        फिर पापनाशन सूक्त,इंद्राह्वान मंत्र,अग्निहोत्र गायत्रीमंत्र मंत्र अलग अलग अवसरों पर अलग अलग मंत्रों का प्रयोग क्या है???

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प्रश्न- मूर्तिपूजा सीढ़ी है।मूर्तिपूजा करते-करते मनुष्य ईश्वर तक पहुंच जाता है।

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नहीं-नहीं,मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं किन्तु एक बड़ी खाई है जिसमें गिरकर (मनुष्य) चकनाचूर हो जाता है,पुनः इस खाई से निकल नहीं सकता किन्तु उसी में मर जाता है।"


 महर्षि जी आप गलत हो.कक्षा पहली के छात्रों को महाविद्यालय की जटिल थ्योरी पढ़ाते हो.

   आपने मंदिर जाने वालों को ब्याविचारी पंण्डित को ऐय्याशी बताया है. मूर्ति पूजा करनेवालों को माता पिता का अनादर करनेवाला कृतघ्न बताया है.

       कितने ही लोग मंदिर जाकर मत्था टेककर आते हैं उन्हें हमने मातापिता की सेवा करने वाला देखा है. मंदिर के पुजारी को सदाचारी देखा है.

      आपने शिवमूर्ति पर लोटा लाओ कुल्ला करो थूकने की बात कही है.

आप गलत हैं. पहली जमात के छात्रों को पढ़ाने समझाने सिखाने की जरूरत है. उन्हें अनपढ़ जाहिल मूरख कह देना समाधान नहीं है.

महर्षि जी आप ने ऐसा क्यों कहा कि मंदिर जाने वाले व्याविचारी होते हैं, पंडित दुराचारी होता है और उसकी पत्नी परपुरूष गामी होती है. मूर्ति पूजक मातापिता का अनादर करनेवाला होता है!??

    आपको आपके पिताजी ने घर से मारकर क्यों भगाया था.?Published from Blogger Prime Android App

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