ईसाई मिशनरी गरीब आदिवासी बस्तियों में ही क्यों जाते हैं??

#ईसाईकसाई_गरीब_दलित_बस्तियों_में_ही_क्यों_जाते_हैं?

                  चंगाई कोइ नया चीज नहीं है।देहातों में यह झाड़फूंक के रूप में हजारों वर्षों से प्रचलित है।

यह साइकिक ट्रिटमेंट है।और इसके लाभ भी होते हैं।इसलिए आदिवासी,दलित, पिछड़े समाज में पैठ बनाने के लिए मिशनरी को उन्हीं की तरह होना पड़ता है।

कोइ बहुत बड़ा विद्वान शिक्षक भी अगर बच्चे को पढ़ाते हैं तो उन्हें बच्चों के स्तर पर आना होता है।

     बच्चा शिक्षित होकर शिक्षित होकर स्वविवेक का इस्तेमाल कर सकता है।ईसाईयत के गुण गा सकता या नास्तिक बन सकता है या फिर सनातन संस्कृति अपना सकता है वह स्वतंत्र है।

                    ईसाईयत का काम है दमित,शोषित, पिछड़े असहाय, निसहाय, रोगी निर्बल और जरुरतमंदों अनाथों को सबल बनाये और ईसाईयत बखूबी अपना धर्म निभा रहा है.

        जितने साधू संत पुजारी पंडित मठ आश्रम हैं, बड़े धार्मिक संगठन हैं.वेदों की ओर लौटने का आह्वान करनेवाले हैं

वे अगर गरीब गंदी बस्तियों में जाकर कपड़े राशन बाँटते,उनकी जरुरतों को जानते,सेवाएं देते.वहां स्कूल खोलकर सबको पढ़ाने,जागरूक बनाने उनके जीवन स्तर सुधारने में नशामुक्ति के लिए प्रयास करते तो इशाईयत की जरुरत ही नहीं रहती.

    लेकिन नहीं... 

जहाँ आप जाना भी पसंद नहीं करते वहाँ गंदी बस्तियों में मिशनरी जाकर अपना धर्म निभायें गरीबों अनपढ़ों के लिए काम करें तो आपको पीड़ा होती है. आपके धर्म खतरे में आ जाते हैं!!Published from Blogger Prime Android App

    

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