शिक्षक दिवस अमर रहे...
👨🏽🏫गुरू और शिक्षक।।👨🏽🏫
मुझे व्यक्तिगत तौर पर बड़ा अफसोस होता है कि आज दुनियाभर में गुरूओं का अकाल है और शिक्षक अपना व्यवसाय निभा रहा है. शिक्षक और गुरू में बड़ा भेद है. अंतर है.शिक्षक शिक्षा के बदले में दक्षिणा,अर्थ की चाह करता है और गुरु अपनी शिक्षाओं को शिष्य तक नि:स्वार्थ पहुंचा कर उसे उसके व्यवहार में देखकर धन्य महसूस करता है.शिक्षक से छात्र ज्ञानी बनकर निकलता है जबकि गुरु से शिष्य रूपांतरित हो जाता है।
आज गुरु का टोटा है और गुरूघंटाल बाजारों में ब्यवसाय कर रहा है. भारतवर्ष में भी चौथी पांचवीं, छठी सदी तक बड़े गुरु हुए. तब भारत विश्व गुरू कहलाता था. आध्यात्म हब या केंद्र हुआ करता था. आर्यभट्ट, चाणक्य, कबीर आदि सच्चे अर्थों में यहां गुरु हुए. एक समय था जब शिष्य गुरू को दक्षिणे में अंगूठे तक कुर्बान करते थे. आज छात्र शिक्षक को अंगूठा दिखाते हैं.
पूरे विश्व में एक यूनीक गुरू,रब्बी भी हुए जिनकी तालीमें सर्वकालिक, सर्वभौमिक,आध्यात्मिक तौर से आज भी प्रासंगिक हैं. "कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे उसे दूसरा भी फेर दो,बुराईयों से तौबा करो और अपने गुनाहगारों को माफ करो,अपने पड़ौसियों को अपने समान प्रेम करो,बैरियों के लिए दुआ कर.
धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।
धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।
धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।
धन्य हैं वे, जो मेल करवाने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे।
तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इस के कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए।
तुम जगत की ज्योति हो; जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।
और लोग दिया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुंचता है।
परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा: और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे “अरे मूर्ख” वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।
इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहां तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के साम्हने छोड़ दे।
[और जाकर पहिले अपने भाई से मेल मिलाप कर; तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।
परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका।
यदि तेरी दाहिनी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए।
परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उस की ओर दूसरा भी फेर दे।
जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उस से मुंह न मोड़॥
परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।
क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?
और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?
इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥(मत्ति 5) ये उस उस गुरू की उन तालीमों में से हैं जो सर्वकालिक प्रासंगिक हैं इन बातों को अमल में लाने वाले का व्यक्तित्व निश्चय रूपांतरित हो जायेगा.....शिक्षक दिवस मुबारक💐💐💐💐💐💐💐🌻🌻🌻🌻💐💐💐💐💐
आलोक कुजूर5/9/2018
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