स्वामी का अनर्थ नियोग.

#दयापंथियों_के_स्वामी_का_अनर्थ■■■

उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।

हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥

~ऋ० {मं० १०, सू० १८, मं० ८}

“हे (नारि) विध्वे तू (एतं गतासुम) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ के (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभि जीवलोकम) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो और (उदीष्र्व) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्यदिधिषो:) तुम विध्वा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त पति के सम्बन्ध् के लिये नियोग होगा तो (इदम्) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव) तेरा होगा। ऐसे निश्चययुक्त (अभि सम् बभूथ) हो और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे”#महर्षि_भाष्य

यहाँ #नियोग कहाँ है कि महर्षि ने नियोग बता दिया??

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हे (नारि)= स्त्री, तेरे पति मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं इसलिए, (उदीर्ष्व)= उठ और इस, (जीवलोकम् अभि)= जीवित संसार अपने पुत्रादि और घर-परिवार का तू ध्यान कर, इस प्रकार (गतासुम)= गत प्राण, (एतम्)= इस पति के, (उपशेष)= समीप बैठ शौक करने का क्या लाभ? (एहि)= उठ और अपने घर को गमन कर, (हस्तग्राभस्य)= अपने गर्भ में सन्तान को स्थापित करने वाले, (तव पत्यु:)= अपने पति की,(इदं जनित्वम्)= इस सन्तान को, (अभि)= ध्यान करती हुई, (संबभूथ)= अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए यत्नशील हो....

        ऐय्याशी मानसिकता पालने, और ब्रहमचारी होकर संभोग आसन्न,#योनिसंकोचन, चुंचुक लेपण बताने वाले शख्स के भाष्य  कैसे होंगे!!?Published from Blogger Prime Android App

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