वेदों में परस्पर विरोधी बातें..

#वेदों_में_परस्पर_विरोधी_बातें◆◆◆◆◆◆◆

न तस्य प्रतिमा ऽ अस्ति यस्य नाम महद् यशः। हिरण्यगर्भ ऽ इत्य् एषः।

मा मा हिमसीद् इत्य् एषा। यस्मान् न जात ऽ इत्य् एष॥ ~यजुर्वेद {३२/३}

कासीत् प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्।

छन्दः किमासीत्प्रौगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे॥ ~ऋग्वेद {१०/१३०/३}

सबकी यथार्थ ज्ञानबुद्धि कौन है और प्रतिमा मूर्ति कौन है, और जगत का कारण कौन है, और घृत के समान सार जानने योग्य कौन है और सब दुःखों का निवृत्ति कारक और आनंद युक्त प्रिति का पात्र परिधि कौन है और इस जगत् का पृष्ठावरण कौन है और स्वतंत्र वस्तु और स्तुति करने योग्य कौन है, यहाँ तक तो इसमें प्रश्न है अन्त में सबका उत्तर इसमें है कि जिस परमेश्वर मूर्ति को इंद्रादि ने पूजा, पूजते है और पूजेंगे वह परमात्मा प्रतिमा रूप से जगत् में स्थित है और वो ही सारभूत घृतवत् स्तुति करने योग्य है

ये प्रश्नोत्तर क्रम है इसे वाकोवाक्य भी कहा जाता है,

समझने वालों को तो इतने से ही समझ लेना चाहिये, और न मानने वाले को तो साक्षात् परमात्मा भी नहीं समझा सकता प्रमाण रावण कंस शिशुपालादि को कहाँ समझा पाये।

औरों की तो बात ही क्या मूर्तिपूजा पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले भी दयानन्दजी कृत संस्कारविधि ६२-७४ में #उलूखल #मूसल #छुरा #झाङू #कुश #जूते तक का पूजन करते पाये जाते हैं।

इसलिए #दयापंथी औरों को नसीहत देते हैं और आईना नहीं देखते...!!!!

घोरआश्चर्यPublished from Blogger Prime Android App

Comments

Popular posts from this blog

परमेश्वर झूठ बोलता है. शैतान को बनाने वाला भी वही है.

दयानन्द और गुप्त संस्था Freemason

प्रायश्चित्त करनेवालों ईश्वरीय अनुग्रह होती है.