मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना◆◆◆

#मुण्डे_मुण्डे_मतिर्भिन्ना●●●

एक ही वेद मंत्र और भावार्थ और भाष्य अनेक हो सकते हैं भावर्थ और भाष्य कैसा हो यह भाष्य भावर्थ करनेवाले की मानसिकता पर निर्भर करता हैं क्योंकि वेद गेय है कविता है. इसीलिए जितने भाष्यकार उतने भाष्य हैं. अपनी जगह सभी भाष्यकार ठीक हैं. ऊवट,महिधर, सायणाचार्य, मैक्समूलर अपनी जगह ठीक हैं. दयानन्द अपनी जगह ठीक हो सकते हैं.

        दयानन्द ने तो नकल भर मारा है. हम सायणाचार्य के भाष्य को ही प्रमाणिक मानते हैं. सायणाचार्य ही एकमात्र ऐसे भाष्यकार थे जिन्होंने संपूर्ण वेद का वेदमंत्रों के अर्थ तीन प्रकार से किये जाते हैं-#आधिभौतिक, #आधिदैविक और #आध्यात्मिक. वेदों का भाष्य अति प्राचीन काल से होता आया है. सायणाचार्य के अतिरिक्त किसी भाष्यकार ने चारों वेदों का पूर्ण भाष्य नहीं कर पाया. प्राचीन वेद भाष्यकारों में स्कन्द स्वामी, उद्गीथ, बररूचि,वेंकटमाधव,आत्मानंद, भरतस्वामी आदि का नाम उल्लेखनीय है.

 सायणाचार्य के वेद भाष्यों में व्याकरण का भी ध्यान रखा गया है. सायणाचार्य भाष्य के आधार पर ही कुछ भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने वेद भाष्यों की रचना की है. यास्काचार्य ने #निरुक्त में वेद भाष्य के मार्ग लिया किन्तु मंत्रार्थ के अतिरिक्त किसी भी वेद का भाष्य उन्होंने नहीं किया.

        सायणाचार्य ने "निरुक्त" का भी अपने वेद भाष्यों में प्रयोग किया है. सायणाचार्य ने प्राचीन परंपरागत अर्थ शैली को ही अपनाया है और उसकी पुष्टि के लिए श्रुति, स्मृति, पुराण तथा अन्यान्य धर्म ग्रंथों का प्रमाण भी उद्धृत किया है.

       सायणाचार्य सभी भाष्यकारों में बड़े और प्रमाणिक हैं.

     दयानंद जैसे संदिग्धज्ञानधारी उन्हीं के भाष्यों की नकल कर अपने हिसाब का जैसे दर्जी कपड़ों का कांटछांट करता है वैसे ही कांटछांट किया है.

#दयापंथी दयानंद को स्वामी और महर्षि बताकर सायणाचार्य को कमतर बताते हैं. सायणाचार्य को मूर्ख और दयानन्द को महान बताते फिरते हैं.

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