राधाकृष्ण चोर थे??



राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 में तेलुगू भाषी  परिवार में हुआ, उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के सर्वपल्ली गांव में रहते थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दर्शन के क्षेत्र में प्रसिद्धि 1923 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ से मिली।


इसी पुस्तक पर शोध-छात्र जदुनाथ सिन्हा ने उनके ऊपर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया। मामला यह था कि जदुनाथ सिन्हा ने पीएचडी डिग्री के लिए ‘भारतीय दर्शन’ नामक अपने शोध को 1921 में तीन परीक्षकों क्रमशः डाॅ. राधाकृष्णन, डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डाॅ. बी. एन. सील के समक्ष प्रस्तुत किया। वे अपनी पीएचडी डिग्री की प्रतीक्षा करने लगे। 


जदुनाथ सिन्हा की डिग्री देने में लगभग दो साल का समय लगाया डॉ. राधाकृष्णन ने लंदन से इस पीएचडी को पुस्तक के रूप में अपने नाम से प्रकाशित करा लिया और पुस्तक छपने के बाद जदुनाथ सिन्हा को पीएचडी की डिग्री भी उपलब्ध करा दी जिससे साहित्यिक चोरी का इल्जाम साबित न हो सके।


जैसे ही किताब बाजार में आई जदुनाथ तो स्तब्ध रह गए वो पुस्तक उनके पीएचडी की हूबहू कॉपी थी उनसे ये बर्दास्त न हुआ और उन्होंने बीस हजार रुपये का दावा कर केस ठोक दिया इसके बदले में  राधाकृष्णन ने भी जदुनाथ पर एक लाख का मानहानि का दावा कर दिया।

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परंतु जैसे ही जदुनाथ सिन्हा ने डाॅ. बी. एन. सील के यहां 1921 में प्रस्तुत की गई अपने शोध की प्राप्ति रसीद न्यायालय में प्रस्तुत किया, सच्चाई सामने आ जायेगी यह सोच कर राधाकृष्णन घबरा गए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दोनों लोगों के बीच मध्यस्थता किया और न्यायालय से बाहर जदुनाथ को दस हजार रुपये देकर समझौता कराया।


जिस व्यक्ति की सबसे प्रसिद्ध किताब पर ही साहित्यिक चोरी का आरोप लगा हो और यह आरोप साबित भी हुआ हो, उस व्यक्ति के नाम पर शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य क्या है? क्या इनके अलावा कोई अन्य काबिल व्यक्ति देश मे नही ?


देश का शिक्षक दिवस किसी  थीसिस चोर के नाम पर नही मनाया जाना चाहिये।Published from Blogger Prime Android App


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