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मसीहियत का जीवन इतना सरल भी नहीं जितनी दुनिया समझती है.क्योंकि लिखा है "तुम सभाओं में पेश होगे,प्रताड़ित होगे, अनादर होगे"लोग आसानी से कह जाते हैं लालच में आकर लोग मसीहियत कबूल रहे हैं. सच तो ये है कि ये उसी प्रताड़ना, अपमान और दमनात्मक कार्रवाहियों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.जैसा ईसा ने सहा है कष्ट और अनादर निश्चय ही उन सब के जीवन में आयेंगे जो मेमने के पीछे पीछे चलने का प्रयत्न करते हैं। हरेक के लिये इस कष्ट का बाहरी रूप अलग अलग हो सकता है और इसकी गहराई कम या ज्यादा। परमेश्वर को पता है कि वह क्या कर रहे हैं और हमारी आवश्यकता के अनुरूप ही इसे होने देंगे। इस लिये हमारे कष्टों के कारण हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है और न ही हमें दूसरों से अपनी तुलना करनी चाहिये जिनका जीवन हमसे अच्छा दिखता हो। बल्कि हमें उन्हें वैसे ही स्वागत करना चाहिए जैसे हम कैन्सर से छुटकारा दिलाने वाले सर्जन की छुरी का करते हैं। ये स्वर्ग में रहने वाले पिता के द्वारा भेजे गये हैं जो अपने बच्चों का भला चाहते हैं। हमारे अन्दर का पाप निर्मूल होना ही चाहिए और हमारे सर्वशक्तिमान पिता के पास इसका अन्य कोई उपाय नहीं है।
आज एक भी मसीही सामने आकर कह दे कि मैंने लालच में आकर मसीहियत अपनाई है, एक इल्जाम साबित हो जाये कि कोई जबरन ईसाईयत कबूल करवाई हो....
क्योंकि ईसाईयत में लालच और जबरन के लिए कोई जगह नहीं... लिखा है "जहाँ तुम्हारी कद्र नहीं होती,पैर की धूल झाड़कर निकल जाओ"फिर सवाल वहीं है कि ये जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने वाले कौन से ईसाई हैं. स्वयं ईसा ने धर्म जबरन परिवर्तन कराने वालों को संपोले कहा है तो ये संपोले कौन हैं?
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