सोमरस नशीला पेय है.

वनस्पति शास्त्र और आयुर्वेद में एक लता का वर्णन है जिसे सोमवल्ली कहते हैं। इसे महासोम, अंसुमान, रजत्प्रभा, कनियान, कनकप्रभा, प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान, चन्द्रमा, गायत्र, पवत, जागत, साकर आदि नामो से भी जानते हैं।Published from Blogger Prime Android App

इसका वैज्ञानिक नाम Sarcostemma Acidum  है, और यह Apocynaceae परिवार का सदस्य है.इसे कूट पीसकर रोयेंदार चमड़े से छाना जाता है. सोमरस बनाने की विधि वेदों में भी इसमें दूध और दही मिलाकर शीतल बनाया जाता था.

 दही में लैक्टिक एसिड होता है.

  सोमरस में कड़वी, सफेद क्रिस्टलाभ एल्केलाइड क्षराभ तत्व होता है जो मनोस्फूर्तिदायक,उत्तेजक तत्व होता है. जिसका प्रभाव अस्थाई रूप से आलस्य दूर करने और सतर्कता बहाल करने में होता है. इसमें हल्की खुमारी के साथ पौरूष शक्ति वर्धक तत्व भी होता है.

(ऋग्वेद-1/5/5) ...हे वायुदेव! यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है। आइए और इसका पान कीजिए।। (ऋग्वेद-1/23/1)

 जिस स्वर्ग को दयापंथी काल्पनिक बताते हैं.उसी स्वर्ग से सोम उतरी है..अग्नि की भांति सोम भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया। 'मातरिश्वा ने तुम में से एक को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा; गरुत्मान ने दूसरे को मेघशिलाओं से।' हे सोम, तुम्हारा जन्म उच्च स्थानीय है; तुम स्वर्ग में रहते हो, यद्यपि पृथ्वी तुम्हारा स्वागत करती है। सोम की उत्पत्ति का पार्थिव स्थान मूजवंत पर्वत (गांधार-कम्बोज प्रदेश) है'। -(ऋग्वेद अध्याय सोम मंडल- 4, 5, 6)

    कूटे पीसे सोमरस को पवित्र चमड़े में छानने की विधि बताई गई है. अब यह पवित्र चर्म किस जानवर का होता है??।उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि।। (ऋग्वेद सूक्त २८ श्लोक ९)

       

जब से इस धरती पर मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से शराब और मदिरापान के सेवन का भी इतिहास रहा है.

हालाँकि हर दौर में इसका स्वरुप बदलता रहा है धर्मग्रंथो में भी सोमरस, मदिरा और सुरापान का उल्लेख मिलता है. लेकिन कुछ लोग आजकल की शराब को ही सोमरस बताते है लेकिन इसके पीछे की सच्चाई अलग ही है.

      शराब में कभी दूध नहीं मिलाया जाता जबकि सोमरस गाय के दूध,घी और शहद मिलाकर बनाया जाता है. यह सोम(लता जड़ी) को कूटपीसकर दूध के साथ तैयार पेय है. सीमित मात्रा में इसका सेवन लाभकारी है. अनिश्चित मात्रा खुमारी लाती है, इससे नशा होता.    

       भांग भी शराब नहीं यह जड़ीबूटियों से तैयार पेय है. इसमें भी गाय का दूध मिलाया जाता है.

    धर्म ग्रंथों में सोमरस के बारे में लिखी है जिसमें सोमरस में दूध और दही मिलाने की बात की गई है. ऋचाओ में लिखा है कि ‘यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दही मिला हुआ सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त हो’. ऋग्वेद में सोमरस के बारे में लिखा हुआ है ‘हे वायुदेव, यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिलाकर तैयार किया गया है आइये और इसका पान कीजिये’.

        ऋग्वेद में सोमरस बनाने की विधि बताई गई है जिसके अनुसार, सोम की लताओं को मुसल से कुचलकर उसका रस निकाला जाता है. इस रस को छानकर इसमें गाय का दूध मिलाया जाता है. कहीं-कहीं शहद या घी के साथ मिश्रित करने की विधि भी मिलती है इस तरह सोमरस को बनाया जाता था. सोमरस का इस्तेमाल उस समय देवताओं के अनुष्ठान में किया जाता था.

       भांग शराब नहीं लेकिन नशीला द्रव्य है.

सोमरस शराब नहीं लेकिन खुमारी लाती है.यह देवताओं का ब्यसन है, यह बिना एल्कोहॉलिक पेय है. जिसकी सीमित मात्रा लाभकारी और असीमित मात्रा ब्यसन है. यह शराब नहीं पीने वालों के लिए शराब का विकल्प है. संत,देवता, श्रेष्ठ आर्य इसका सेवन करें.हिसाब से लो तो दवा है नहीं तो दारू है

#सोमरस आर्यों में सोमरस इतना प्रिय क्यों हुआ ? सोमरस से आविष्ट हो इन्द्र दैत्यों और असुरों को परास्त करते हैं। हिमालयोत्तर-प्रदेश में, जो स्वभावतः ठण्ढा रहा होगा और है, सोमरस का पीना अस्वाभाविक नहीं। सोमरस के पत्थरों से पीसे जाने का वर्णन ऋग्वेद में बहुलता से मिलता है। सोमलता हिमालय की तराई या हिमालयोत्तर-प्रदेश-- ख़ासकर काराकोरम के आसपास अब भी पायी जाती है। यह सोम आर्यों की अपनी सम्पत्ति है। अहुरों (असुरों) का इससे कोई सम्बन्ध नहीं। अवश्य ही सुर-दल को पहाड़ी प्रदेशों में आने के कारण कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं; परन्तु सोम उनके प्राणों का आधार है। यह पदार्थ, यह रस हिमालयोत्तर प्रदेश का ही स्मरण कराता है।

ऋग्वेद के सभी देवता सोमरस के मतवाले हैं; आर्यों के सभी यज्ञों में सोमरस की पग-पग पर आवश्यकता है। सोम-स्तुति पर ऋग्वेद का एक सम्पूर्ण मण्डल ही समर्पित है। अवेस्ता में भी इसका नाम है Haum, परन्तु इसकी वह महिमा नहीं, जो आर्यों के ऋग्वेद में है। अवेस्ता में सोमरस का पीनेवाला इन्द्र महज़ Demon हो जाता है और यहाँ इन्द्र आर्यों के एकमात्र उद्धारक बन जाते हैं। हमारे यहाँ सुरा की एक कथा प्रचलित है। यह सुरा सोमरस के सिवा और कुछ नहीं। पहले सुर और असुर दोनों आर्य ही थे; परन्तु जिन लोगों ने सुरा नहीं ग्रहण की, वे असुर और जिन्होंने ग्रहण की, वे सुर कहलाये। रामायण का यह श्लोक इसी प्रकार का है-

सुराप्रतिग्रहाद्देवाः सुरा इत्यभिविश्रुताः। अप्रतिग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरास्तथा॥🙄🙄🙄

Comments

Popular posts from this blog

परमेश्वर झूठ बोलता है. शैतान को बनाने वाला भी वही है.

दयानन्द और गुप्त संस्था Freemason

प्रायश्चित्त करनेवालों ईश्वरीय अनुग्रह होती है.