ईसा मसीह के बारह से तीस साल कहाँ बीते? क्या ईसा मसीह ने कश्मीर आकर बौद्ध मठों में दीक्षाएं ली थी??

#ईसा_12_से_तीस_बरस_तक_कहाँ_रहे?

#ईसा_इस_दौरान_कश्मीर_में_आकर_वेदाध्ययन_किया●●●●●●●

     यह सवाल अक्सर पूछा जाता है.

   बाइबल में इंसानों के लिए परमेश्वर, उसके राज्य, उसके साथ हमारे संबंध, उसके कार्य, गुण, कार्यविधि, नियम, आज्ञाओं इत्यादि के विषय में बहुत कुछ दिया गया है, किन्तु परमेश्वर और उसके बारे में सब कुछ नहीं दिया गया है; क्योंकि बाईबल में इंसानों के लिए वही सब लिखा गया है जो हम जानें और मानें और जिससे हम उसकी निकटता में आएँ, उद्धार पाएँ और उसके परिवार का भाग बन जाएँ।आदम से ईसा तक तात्कालिक और असार्वकालिक आदेश और विधान थे.ईसा को वह अधिकार मिला कि ईसा लोगों के लिए सार्वभौमिक, सार्वकालिक ईश्वरीय विधान परिमार्जित करे.इसे नया विधान कहा जाता है.

यद्यपि बाइबल में ईसा के लड़कपन से लेकर उनके सेवकाई आरंभ करने (12 से 30) की आयु तक का विवरण नहीं दिया गया है, किन्तु बाइबल इसके विषय में बिलकुल खामोश भी नहीं है। यह परमेश्वर और ईसा के विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रम है कि बाइबल उनके 12 से 30 वर्ष की आयु के बारे में कुछ नहीं बताती है; और अपने द्वारा फैलाए गए इस भ्रम के आधार पर वे यह एक और झूठ फैलाते हैं कि प्रभु यीशु भारत आए थे यहाँ से सीख कर वापस इस्राएल गए थे। सच तो यह है कि बाइबल स्पष्ट बताती है कि प्रभु यीशु वहीं इस्राएल में अपने परिवार के साथ ही रहे थे। इस संदर्भ में बाइबल में, सुसमाचारों में, दिए गए कुछ पदों को देखिए:

मत्ती 13:54 “और अपने देश में आकर उन की सभा में उन्हें ऐसा उपदेश देने लगा; कि वे चकित हो कर कहने लगे; कि इस को यह ज्ञान और सामर्थ के काम कहां से मिले?”

मरकुस 6:2-3 “सब्त के दिन वह आराधनालय में उपदेश करने लगा; और बहुत लोग सुनकर चकित हुए और कहने लगे, इस को ये बातें कहां से आ गईं? और यह कौन सा ज्ञान है जो उसको दिया गया है? और कैसे सामर्थ के काम इसके हाथों से प्रगट होते हैं? क्या यह वही बढ़ई नहीं, जो मरियम का पुत्र, और याकूब और योसेस और यहूदा और शमौन का भाई है? और क्या उस की बहिनें यहां हमारे बीच में नहीं रहतीं? इसलिये उन्होंने उसके विषय में ठोकर खाई।”

लूका 2:39-40 “और जब वे प्रभु की व्यवस्था के अनुसार सब कुछ निपटा चुके तो गलील में अपने नगर नासरत को फिर चले गए। और बालक बढ़ता, और बलवन्‍त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया; और परमेश्वर का अनुग्रह उस पर था।”

लूका 2:51-52 “तब वह उन के साथ गया, और नासरत में आया, और उन के वश में रहा; और उस की माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं। और यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया।”

लूका 4:16 “और वह नासरत में आया; जहां पाला पोसा गया था; और अपनी रीति के अनुसार सब्त के दिन आराधनालय में जा कर पढ़ने के लिये खड़ा हुआ।”

यूहन्ना 7:15 “तब यहूदियों ने अचम्भा कर के कहा, कि इसे बिन पढ़े विद्या कैसे आ गई?”

 

ध्यान कीजिए, मत्ती, मरकुस और यूहन्ना के हवाले यह स्पष्ट दिखा रहे हैं कि ईसा की शिक्षाओं को सुनकर सब को अचम्भा होता था कि उन्होंने वह सब कैसे जान लिया जो वे प्रचार करते थे। अर्थात, वे लोग जानते थे कि ईसा कभी कहीं शिक्षा पाने नहीं गए थे, उन्हीं के मध्य रहे थे, परन्तु फिर भी इतना कुछ सीख गए थे, अद्भुत प्रचार कर सकते थे। यदि ईसा कहीं गए होते, तो लोग फिर यह कहते कि “उन्होंने समझ लिया कि वह यह सब उस परदेश से सीख कर आया था जहाँ वह गया हुआ था” – किन्तु किसी ने भी कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहा। दूसरी बात, ईसा ने जो भी प्रचार किया वह परमेश्वर के वचन के उस भाग, जिसे हम आज बाइबल के पुराने नियम के नाम से जानते है, से था। यदि ईसा कहीं बाहर से कुछ सीखकर आए होते तो पुराने नियम से नहीं सिखाते वरन उस “ज्ञान” के अनुसार सिखाते जिसे वे सीख कर आए थे – किन्तु ऐसा कदापि नहीं था। उनकी सारी शिक्षाएँ पुराने नियम पर आधारित थीं।

लूका के हवालों पर ध्यान कीजिए – ये तीनों हवाले स्पष्ट दिखाते हैं कि प्रभु यीशु की परवरिश वहीं गलील के नासरत में, जो उनका निवास-स्थान था, हुई थी।

इसलिए चाहे बाइबल में उनकी 12 से 30 वर्ष की आयु के बारे में कोई विवरण नहीं है, किन्तु इतना अवश्य प्रगट है कि प्रभु वहीं नासरत में अपने परिवार के साथ ही रहे थे और लोगों ने उन्हें बड़े होते हुए देखा और जाना था।

        ईसा की शिक्षायें यहुदी शिक्षाओं के उलट सीधे परमेश्वर से जुड़ने के आग्रह से परिपूर्ण था.

ईसा ने परमेश्वर को पिता और भले और धर्मियों को ईश्वर की संतान बताते थे.

      ईसा कश्मीर आकर वेदादि ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त किया मंठों में दीक्षाएं ली यह निराधार इसलिए भी है क्योंकि ईसा ने एक भी वेद मंत्र का इस्तेमाल अपने प्रवचनों में नहीं किया.

  यदि ईसा 12से 30 बरस तक भारत में रहे होते तो उनपर भाषा और संस्कृति का प्रभाव जरूर होता.अतः यह कहना कि ईसा कभी कश्मीर आये थे यह गलत और कयास भर है.

         बेबुनियाद आक्षेप करनेवाले ऐसा कहते हैं.जीजस इस्रायल लौटने से पूर्व उन्होंने बहुत समय, हिमालय के तिब्बत के बौद्ध विहारों में बिताया, जहाँ उन्होंने गौतम बुद्ध के निर्वाण मार्ग पर अध्ययन किया। पश्चिम की ओर यात्रा शुरू करने से पहले भारत के बौध्‍द भिक्‍खुओं ने जीसस को कुछ स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आपकी मृत्यु अवश्य है, इसलिए भारत में उनका भला चाहने वालें बौध्‍द भिक्‍खुओ ने उसे चंगा करने वाली हिमालय कि औषद, द्रव्य के रूप मे दी और यह द्रव्य उनको देकर स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि जब भी ऐसा प्रतीत होता है कि आप कि मृत्यु अब निश्चित है तब आपका कोई विश्वासपात्र शिष्य हो उसके हातो से यह द्रव्य अपने शरीर पर डालने के लिये कहना।

क्रूस से उनके शरीर को उतारने के बाद मेरी मग्दलेन ने यही द्रव जीजस के शरीर पर लगातार तीन दिनों तक लगया और वहीं से वो तीसरे दिन चंगे होकर भारत कि ओर चल पड़े......


ईसाइयो ने एक इस घटना को यह कहकर जनता को भर्मित किया कि जीजस ‘सवर्ग’ चले गए, जबकि जीजस सूली से उतरकर भारत आये। संत मैथ्यू और संत जोन, दोनों ईसाई के प्रचारक थे और जिजस के प्रत्यक्षदर्शी थे लेकिन इन्‍होने सवर्ग जाने वाली बात अपने लेखनी में नही कही क्योंकि उन्हें मालूम था जिजस स्वर्ग नहीं भारत गये थे। ईसा मसीह के स्वर्गारोहण जाने कि बात सिर्फ संत मार्क और संत लुके ने ही कही है जबकि यह दोनों उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे। 2 री शताब्दी के लिओन के संत इरेनौस द्वारा इस बात की पुष्टि की गई है कि ईसा मसीह ने 33 वर्ष कि आयु में अपना शरीर नहीं त्यागा और नाही जिजस स्‍वर्ग गये। आज भी वेटिकन ने धर्म की राजनीति का खेल खेलते हुए ईसा से सम्बंधित न जाने कितने तथ्यों को छुपाया हुआ है।

यह भी जानकारी सामने आती है कि जिजस अपनी माता और पत्नी 'मेरी मग्द्लेन' के साथ भारत ही आये बाद में उनकी एक पुत्री 'सारा' भी भारत पहूची कहा जाता है उनकी माता मरियम की कब्र आज भी कश्मीर में है….

“जीजस भारत में” इस विषय को लेकर सभी लेखोंको के किताबो का मूल आधार तिबेटियन बौद्ध साहित्य रहा है! विश्व स्तर पर सबसे चर्चित किताब Jesus Lived In India by Holger Kersten कि है, इसी किताब और पुरातत्विक अवशेषो को लेकर अन्य लेखको ने अपनी लेखनी चलाई और इन्ही के किताबो का आधार लेकर मैं अपनी कलम चला रहा हूँ!

सम्राट अशोक कि दादी हेलेना जो सम्राट चंद्रगृप्तस मौर्य कि पत्नी और युनानी सेल्यूस कि बेटी थी। हेलेना उस समय कि विश्व्सुंदरी थी और सौंदर्य की मलिका थी। निश्चित सम्राट अशोक का अपनी दादी के पारिवार से संबंध रहा होगा। सम्राट अशोक, बुध्द का प्रबल अनुयायी रहा है और बौध्द वैश्विक नैतिक आचार संहिता को विश्व के हर कोणे में संचारीत किया, इस दृष्टी से बुध्द के शिक्षा का प्रभाव सेल्यूस के वंशजो पर रहा, इस पर जादा खिचातानी करने कि आवश्कता नही है। 

सम्राट अशोक ने थेर भिखुओं को दुनिया के हर कोणे में भेजा। इन मिशनरी थेर भिक्षुओं में से कुछ अलेक्‍झेडि्रया (मिस्र) जाकर धम्‍म का प्रचार सच्‍ची लगन से करते हुयें चिकित्‍सा सेवा का कार्य करते थे और युनान भी पहुचें। थेर भिक्‍खुओं को उस समय वहा के लोग थेरपुटे (Therapeutae) कहा करते थे। प्राकृत पाली में इस शब्‍द का उच्‍चारण ‘थेरपुत्त’ (Theraputta) है। 


ई.पूर्व (BCE) के बाद जीजस भारत आये थे और इनकी मृत्यु श्रीनगर में हुई। यह विवाद नहीं इस संवाद के सच्‍चाई को स्वीकारना चाहिए कि जीजस एक बौद्ध भिक्खु थे और चौथी बौद्ध परिषद में इनका भारी योगदान रहा! ईसाई धार्मीक साहित्‍य से यह भी जान पडता है कि ईसाई चर्चवासी ईसाई के गठन को प्रभावित करने के लिये थेर भिक्‍खुओं के चिकित्‍सा को Therapeutae  से संचारित किया इसका अनुमान यहूदी के मूल साहित्य से लगाया जा सकता है और थेर-थेरपुटे यह शब्‍द ग्रिक जाते-जाते जिजस के गृहघर का नाम नासरत बना और इसि नासरत शब्‍द से जीजस-नाज़ेरेथ नाम की जिजस की पहचान बनी जो थेर-‘थेरपुत्त’ से सम्बंधित है और थेर-‘थेरपुत्त’ (नाजेरेथ) साहित्‍य ही ईसाई और ग्रिक साहित्य कि जड़ में जाकर जमा है. हमारा उद्देश AD के साहित्‍य को उढ़ाकर BC के साहित्‍य से तुलनात्मक अध्यन करके उसके वर्तमान कि उपयोगीता को महत्‍व देना मात्र है…..

इस विवेचन से यह तो स्पष्ट होता है कि दुनिया के साहित्य चाहे वह धार्मिक हो या एकेडेमिक इसका स्त्रोत मात्र बुद्धिज्म है.....

यह लेख ‘Jesus Lived In India’ by Holger Kersten से प्रेरित है…

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आक्षेप करनेवाले इन सवालों का जवाब देने से बचते हैं

  1. १-जीजस क्या बौद्ध भिक्षु थे और इस्राईल बौद्ध धर्म का प्रचार करने गये थे ??

  1.  २-बुद्ध ने ईश्वर भगवान व अवतारों के अस्तित्व के बारे में क्या कहा है और जीजस की इसपर क्या राय है?

  1. ३- जीजस ने ईश्वर का कॉसेप्ट बुद्ध के किस उपदेश से लिया?

  1. ४-जीजस को किस मठ से जजमेंट डे का ज्ञान मिला ??? आपके अनुसार सारा ज्ञान जीजस को मठों से ही मिला और वो वापस भी मठों में ही लौटकर आ गये थे!?

  1.  ५- जीजस के उपदेश व बुद्ध के बेसिक उपदेशों में इतना भेद क्यों है?बुद्ध ईश्वर को नकारते हैं और जीजस परमेश्वर के अस्तित्व पर मोहर लगाते हुए स्वयं को ईश्वर पुत्र कैसे बताया?आप निर्णय करें कि जीजस ने बुद्ध को माना या रिजेक्ट किया ?? जीजस ने बुद्ध के उपदेशो को गलत साबित किया या नही ?? जीजस ने बुद्ध के धम्म की ज्ञान फैलाया या ईश्वर के राज्य का प्रचार किया?

           ⚛️बुद्ध और जीजस उतने ही विपरीत हैं जैसे दो ध्रुव. जाने लोग जीजस को किस आधार पर बौद्ध भिक्षु साबित करने पर तुले हैं ?? जबकि दोनो की शिक्षा का कॉसेप्ट एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत है और तो और जीजस का कॉसेप्ट तमाम भारतीय संस्कृति के भी विपरीत है.

अगर जीजस भारत आये होते तो उनके प्रवचनों और भाषा शैलियों में भारतीय संस्कृतियां झलकती. क्योंकि कोई भी लंबे अरसे तक कहीं रहे तो वहाँ की भाषाशैली उसे जरूर प्रभावित करती. बाईबल साफ बताती है जीजस कभी बाहर परदेश किसी शिक्षा या दीक्षा के लिए नहीं गए.वह स्थानीय अराधनालयों में ही शास्त्रियों फरीसियों से शास्त्रों पर वाद करते थे.

और लोग आश्चर्य से कहते थे. यह तो कभी पाठशाला नहीं गया ना दीक्षा ली फिर कैसे शास्त्रीय बातें अधिकार से कहता है.!!अतः यह कहना कि ईसा मसीह भारत आये थे यह कहना सरासर बेबुनियाद है झूठ है.लफ्फाजियाँ हैं.Published from Blogger Prime Android App

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