अजीबोगरीब मेले..

#मेले●●●

अजीबोगरीब मेले लगे हैं यहाँ. तरह तरह की दुकानें सजी हैं, बाजार में कड़वे सच के खरीददार कम हैं. नमकीन झूठ बेचने वाली दुकानों में रौनक है. नफरत बेचने की दुकानों के स्पोंसर्स तमाम बड़े लोग हैं. इस मेले में शिरकत करने वाली भीड़ किसी न किसी बीमारी से बीमार हैं. बीमारी है तो हकीम तमाम हैं. शहर में चिकित्सक की जरूरत तभी होती है जब लोग बीमार पड़ते हैं.

            आज समाज बीमार है, लोगों की आस्थायें कुपोषित है, ईमान कमजोर हुआ जा रहा है, धर्म आखिरी सांस ले रही है, यहाँ इंसानियत, भाईचारा, सहिष्णुता बीमार और दुर्बल हो चुकी है.बीमारी न हो तो चिकित्सक का क्या औचित्य है....परंतु बीमारी जाये तो जाये कैसे?

इस मर्ज की दवा क्या है?या लाईलाज है?

      अब चिकित्सक ऊपर से बीमारी का ईलाज करता मालूम पड़ता है लेकिन भीतर से उसकी कामना हिलोरें मारती है कि बीमारी बनी रहे. लोग बीमार पड़ते रहें. चिकित्सक जीता है लोगों के बीमार पड़ने से. उसका धंधा बड़ा उल्टा और परस्पर विरोध लिये है.उसकी प्रार्थना तो ये होती है कि लोग बीमार पड़ते रहें. जब फ्लू, डेंगू,मलेरिया जैसी बीमारियों का दौर होता है वह एकांत में जाकर भगवान का शुक्रिया भी अदा करता होगा. क्योंकि यही उसकी कमाई का अच्छा सीजन है.

        यहाँ सामाजिक, देशिक, आध्यात्मिक बीमारी के ईलाज के लिए तमाम नि:स्वार्थ चिकित्सक हुए. ईसा,बुद्ध महावीर, कृष्ण आदि उन्हीं महान चिकित्सकों में से हैं. लेकिन अफसोस आज सारी जायदाद बेचकर ईलाज कराने के बाद भी मर्ज का सही ईलाज नहीं हो पा रहा है. आज के चिकित्सक दवा के नाम पर नफरत की पुड़िया, दुराग्रह, पूर्वाग्रह का कैप्सूल और असहिष्णुता का एंटीबायोटिक थमा रहा है.Published from Blogger Prime Android AppPublished from Blogger Prime Android App

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