माँसाहार पर दयापंथियों के मासूम बहाने..

#दयापंथियों_के_मासूम_बहाने●●●●

"जो जो प्रमाण आपने प्रस्तुत किया है वह सब ठीक हैं ये सब हमारे ग्रंथों में मिलते हैं. लेकिन ये वामपंथियों,मुगलों ईसाईयों द्वारा बाद में इसमें घुसेड़ दिया गया😓😓यह प्रक्षिप्त है यह मिलावट है. यह गंदगी तुम जैसे विधर्मी लोग हमारे ग्रंथों में मिलावट कर दिये"😓😓😓

यह बहाने स्वीकार्य नहीं हैं.

क्योंकि प्राचीन भारत में ही नहीं बल्कि अभी पिछली कुछ सदियों तक शिक्षा परंपरागत रुप में गुरुमुख से ही प्राप्त की जाती थी.

श्रुतियों में ये शिक्षाएँ थीं.यह ब्राह्मणों के अधिकार क्षेत्र में थे,छापेखाने थे नहीं. ग्रंथ गुरुओं के आश्रमों या राजाओं के पुस्तकालयों में सुरक्षित रखे जाते थे.

क्या दयापंथी यह कहना चाहते हैं कि ब्राह्मणों गुरुओं ने ही इसमें मिलावट की हैं!!?

फिर वामपंथी,मुगलों और ईसाईयों को घढ़ियाली आँसुओं के साथ कोसना दयापंथियों का स्वांग है,ढोंग है??

दयापंथी बतायेंगे ऐसे सुरक्षित श्रुतियों, ग्रंथों की हर भीतरी प्रतियों में तथाकथित वाममार्गियों ईसाईयों मुगलों ने गोहत्या और माँसाहार विषयक श्लोक, मंत्र,दोहे,सोरठे और अध्याय कैसे घुसेड़ दिया??

दूसरे प्राचीन टीकाकारों और भाष्यकारों ने इन स्थानों पर निर्विकार निर्विरोध भाव से व्याख्यान लिखे हैं.

और इन्हें कहीं भी प्रक्षिप्त व धर्म विरुद्ध नहीं कहा.फिर टकाधर्मी दयापंथियों को अपने हिसाब का तोड़मरोड़ को ही धर्म और आर्ष बाकी अनार्ष विधर्म कहने का अधिकार किसने दिया?? 

२०वीं सदी तक स्वामी विवेकानंद जैसे प्रबल हिंदू धर्म प्रचारक जिसने पश्चिमी देशों में भी हिंदुत्व का डंका बजाया इन बातों का समर्थन करते रहे हैं. ऐसे में या तो यह मानना होगा कि भारत में किसी समय सारे लोग वाममार्गी थे.!!

हमारे गुरुओं ऋषियों ने ही ग्रंथों में मिलावट करी है!!   

            या फिर यह मानना होगा कि पुरातन भाष्यकार टीकाकार शंकराचार्य धर्माचार्य, धर्मगुरु धर्म प्रचारक विवेकानंद सहित सभी वाममार्गी थे!!

यदि इस बात को खारिज किया जाये तो यह मान लेना ज्यादा उचित है यहाँ सनातन काल से ही पशुबलियाँ और श्राद्ध माँसाहार अतिथि सत्कार में गोवध होता आया है. आयुर्वेद में माँस मछली चर्बी आदि का प्रयोग होता आया है. और यही ऐतिहासिक सच्चाई भी है. 

     इनका निषेध बौद्धों से संघर्ष के दौरान सामरिक नीति के तौर पर इतिहास के एक विशेष चरण में अपनाया गया.तब तो कथित आर्यों ने जीता था.आज प्रायः ऐसा कहा जाता है कि मुसलमानों और ईसाईयों ने माँसाहार का चलन कर हमारे ग्रंथों में मिलावट करी है.प्राचीन ऐतिहासिक तथ्यों के मद्देनजर माँसाहार विषय पर सांप्रदायिक आग भड़का कर लीडरी चमकाने वालों पर पाबन्दी लगनी चाहिए.Published from Blogger Prime Android App

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