वेद अपौरुषेय कैसे है??


     वेद अपौरुषेय ग्रंथ है.!!!?

जिसे वेद समझा गया उसे अनुभव करनेवाले बोलने बतानेवाले चंद दो चार ऋषि ही थे.उन्हीं की वाणी के संकलनों को वेद समझा गया..!!!

दरअसल जिसे वेद समझा गया है वह प्राचीन ऋषियों के निजी अनुभव हैं. यह ऋषियों के काब्यों, प्रवचनों, प्रार्थनाओं, याचनाओं, आयुर्ज्ञानादि का संकलन मात्र है.

            जब शास्त्र लिखा जाता है तो सामाजिक व्यवस्था के नियम और तात्कालिक बातों को भी लिख दिया जाता है.महापुरुषों,ऋषियों के नाम पर जनता उसे भी ईश्वरीय ज्ञान मान लेती है यद्यपि धर्म से उसका दूर दूर तक संबंध नहीं.

       आधुनिक युग में मंत्रियों के आगे पीछे घूमकर साधारण नेता भी पहुंच के नाम से अपना काम करा लेता है.जबकि मंत्री ऐसे नेताओं को जानते तक नहीं हैं.इसीप्रकार सामाजिक व्यवस्थाकार महापुरुषों की ओट में जीनेखाने की व्यवस्था भी ग्रंथों में लिपिबद्ध कर देते हैं.उनका सामाजिक उपयोग तत्सामयिक ही होता है.वेदों के संबंध में भी यही है.

         वेद के दो भाग हैं:

       #कर्मकांड और दूसरा #ज्ञानकाण्ड.

कर्मकांड समाजशास्त्र है.जैसे वास्तुशास्त्र, आयुर्शास्त्र,धनुर्वेद, गंधर्ववेद इत्यादि.

  ज्ञानकांड उपनिषद है.इसका मूल योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रथम वाणी #भागवद्गीता है.भागवद्गीता अपौरुषेय परमात्मा से समद्भुत उपनिषद-सुधा का सार सर्वस्व है.

#भागवद्गीता_चारों_ऋषियों_के_अनुभवों(वेदों)#_सार_है

      इसी प्रकार प्रत्येक महापुरुष जो परमतत्व को प्राप्त कर लेता है,स्वयं में धर्म ग्रंथ है. बुद्ध,ईसा, कबीर, महावीर उन्हीं में से हैं.उनकी वाणी का संकलन विश्व में कहीं भी हो शास्त्र कहलाता है.किन्तु कतिपय मतावलंबियों का यह मानना रूढ़िवादिता ही है कि वेद अपौरुषेय है अब मिलना बंद है. अब वेद नहीं मिल सकता.

     सत्य तो यह है कि वेद नित्य पाया जा सकता है. वेद चहुंओर बिखरा है बस बटोरनेवालों की कमी है.

   लोग खुद से,ईश्वर से वेद से दूर अपनी वाशनाओं में.खोये हैं. उन्हें वेदों की ओर लौटने की जरूरत है. अतः आओ वेदों(ईश्वरीय ज्ञान)की ओर लौटो....ईश्वर प्राप्ति का यही एकमात्र विकल्प है.

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