जातिप्रथा घिस जानी चाहिए..

#वर्ण_व्यवस्था_और_वर्तमान_प्रासंगिकता.●●●◆◆

         सवर्ण और बहुसंख्यक जिस वर्ण व्यवस्था पर यकीन करता है वह ना तब था और ना अब  विद्यामान है. जो प्राकृतिक सत्य, मौलिकता एवं नैतिकता के विपरीत है उसे मात्र शास्त्रों में उल्लेखित होने भर से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

वर्ण व्यवस्था को कर्माधारित कहकर डामेज कंट्रोल किया जाता है. यह कर्माधारित है तो इसे #कर्म_व्यवस्था कहो.

          समाज में दलितों,आदिवासियों और शूद्रों पर अत्याचार,अन्याय, शोषण तब से होता आया है.बाबा अंबेडकर साहब के कई कटु अनुभव रहे. उनका मानना था कि अंग्रेजी शासन के जुल्म और ज्यादती की तुलना में दलितों और आदिवासियों पर हो रहे अन्याय, अत्यचार और शोसण कई गुना अधिक थे.दलित और आदिवासी असुरक्षा का अनुभव करते थे.

           गाँधीजी यदि दलित घर में जन्म लेते और अंबेडकर सवर्ण परिवार में पैदा होते तो गाँधीजी बिलकुल वही करते जो अंबेडकर ने किया और अंबेडकर भी वही करते जो गाँधीजी ने किया.

           समाज में प्रचलित वर्ण ब्यवस्था को लेकर दोनों महापुरुषों में पहले टकराव जरूर था लेकिन गोलमेज कान्फ्रेंस के बाद वैचारिक टकराव शनैः शनैः कम होता गया.

         दलितों के मंदिर प्रवेश पर मनाही, छुआछूत, शोषण,मूंछें रखने पर,बारात में घोड़ी चढ़ने पर आज भी असहिष्णुता बदस्तूर है.

यहाँ वर्णव्यवस्था को कर्माधारित बताने समझाने डामेज कंट्रोल करने वाले वर्णव्यवस्था क्यों नहीं समझाने आते??

        कथित समाज सुधारक स्वामी दयानंद ने तो शूद्रों,चमारों, निषादों और शमशान घाट पर काम करनेवालों का छुआ खाने से भी मना किया.

      ऐसे में वर्ण व्यवस्था को अब तक घिस जाना चाहिए, मर जाना चाहिए लेकिन कुछ लोग इसे जीवित रखने के लिए अब भी आक्सीजन दे रहे हैं, सभायें कर रहे हैं, डामेज कंट्रोल कर रहे हैं.सच्चाई यही है जो धरातल पर है,👇👇👇👇👇👇👇👇👇Published from Blogger Prime Android App

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