उफ् ये बाजार...

बाजार...

उफ् ये बाजार

खरीद फरोख्त भी एक कला ही है, अगर आप इस कला में पारंगत हैं तो आप शमशान का खाक भी बेच सकते हैं।

यहाँ सब सबकुछ बिकाऊ है।नैतिकता को छोड़कर।दरअसल उसके खरीददार नहीं मिलते और मिलते भी हैं तो फरेब के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते.इस बाजार में साधु अपनी महानता की बोली लगाते दिख जायेगा. महानता के खरीद फरोख्त में काफी मुनाफा है. जिन लोगों के पास पर्याप्त रोटी नहीं होती वे इसके मंहगे खरीददार होते हैं.महानता की ऊंची ऊंची कीमत यही गरीब अदा कर रहा है जिनके पास ओढ़ने बिछाने को सिर्फ आदर्श ही बचा है.

    इस बाजार में नेता, अभिनेता,खबर, नमक, मिर्च, मसाले, आदर्श, विचार, धर्म, कर्म, मर्म,.......

सब बिकाऊ हैं. इसके विज्ञापन बकायदा बाजारों में सजते हैं.ईमान तो बाजार इस बाजार में पुरानी चीज है।

कहीं राम बिकेंगे तो कहीं रहीम के विज्ञापन सजेंगे.

कहीं राधे बाजारों में बिकाऊ हैं कहीं बड़े आदर्शों की निलामी चल रही..यहीं आज ईसा, बुद्ध को भी बिकवाली में.छोड़ रख्खा है.

नैतिकता के खरीददार कम हुए. आज इसके बाजार मंदी में हैं.....कौन उबारे??कौन तारे?Published from Blogger Prime Android App

Comments

Popular posts from this blog

परमेश्वर झूठ बोलता है. शैतान को बनाने वाला भी वही है.

दयानन्द और गुप्त संस्था Freemason

प्रायश्चित्त करनेवालों ईश्वरीय अनुग्रह होती है.