स्वर्ग पर दयानंद और दयापंथियों का कन्फ्यूजन..
स्वर्ग नरक कोई स्थान विशेष नहीं है:दयानंद स्वामी
या तो दयानंद जी कन्फ्यूजन में थे या आर्षग्रंथ झूठ बता रहे हैं.स्वर्ग नर्क का जिक्र वेदों समेत पुराणों, मनुस्मृति और तमाम पौराणिक ग्रंथों में है.
ऐसे में दयानन्द स्वामी का अवैदिक अपूष्ठ संदिग्ध ज्ञान लोगों को भी कन्फ्यूज करता है.
अथर्ववेद में भी कहा गया है.
- स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा।।(१८/४/४)
- स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा।।(१८/४/४)
मने स्वर्ग लोक में अमरत्व प्राप्त हो जाता है.
- स्वर्गलोका अमृतत्वं भजयंते..कठो०
- शोकातिगो मोदते स्वर्ग लोके!![कठो०]
शोकादि दुखों से पार पाया हुआ मनुष्य स्वर्ग लोक में आनन्द से रहता है.
- स्वर्गे लोके न भयं किन्चिनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति।।
[कठो०]
अर्थात स्वर्गलोक को प्राप्त करने वाले को भय तथा बूढ़ापादि नहीं होते.
- त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यु।।
【कठो०】
यज्ञ,अध्ययन तथा दान करनेवाले जन्ममृत्यु को पार कर लेता है.पुनर्जन्म नहीं होता.
- यस्मिन् स्वर्गे देवानां पतिरिन्द्र: एक: सर्वानुपरि अधिवसति।।मुण्डको०१-२-५
स्वर्ग लोक में देवों का स्वामी ईन्द्र सर्वोपरि है. #सर्वे_ते_नरकं_यांति_दृष्टवा_कन्यां_रजस्वलाम●●
उस रजस्वला को देखकर उसकी माता पिता भाई,मामा और बहन सब नर्क जाते हैं.
【सत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समुल्लास, पृष्ठ संख्या 56 संस्करण:अप्रैल 1989】
इसी समुल्लास में परलोक के सुख मनुस्मृति के श्लोकों में बताये गए हैं. (पेज नं.73)
दयानन्द ने परलोक शब्द लिखने के बाद #परजन्म लिखा है.#पुनर्जन्म नहीं. दयानन्द जानते थे कि वेदों में आवागमन नहीं है. बल्कि #स्वर्ग_नरक की बात है.
होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने।।
ऋग्वेद१:५८:६
अर्थात ये प्रभु ही हमारे दिव्य जन्म के लिए होते हैं. प्रभु कृपा से हम जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं.
- अब स्वर्ग नर्क का इंकार करनेवाले दयापंथी बतायेंगे.ये मुक्तात्मा का ठिकाना क्या है?
बार बार जन्मना और मरना अवैदिक कयासी बातें हैं. जन्म एक ही बार और मृत्यु भी एक ही बार होता है. जैसे सभी धर्म शास्त्रों की बातों से स्पष्ट है.
दिव्य जन्म इसी को बाईबल मृत्कोत्थान और पुनरुत्थान बताती है.
हिंदुत्व और इस्लाम भी प्रलय और अंतिम दिन में दिव्याय जन्मने अर्थात पुनरुत्थान होने एंव स्वर्ग की धारणा की पुष्टि करता है.
#पुनर्जन्म_तथ्य_सत्य??
पुनर्जन्म जैसी कोई तथ्य सत्य नहीं है. पुनर्जन्म शब्द लाक्षणिक अलंकारिक शब्द है. पुनर्जन्म(reborn)फिर से जन्म अर्थात नई जिंदगी से है. पुनर्जन्म का मतलब फिर से हमल होकर जन्मना नहीं है. वेदों में इस शब्द को शाब्दिक अर्थों में ही लिया गया है जबकि यह लाक्षणिक अलंकारिक शब्द है.वेद भाष्यकारों ने पुनर्जन्म को यहाँ समझने में फेर की है.वेदों में फिर से जन्म लेने या पुनर्जन्म का जिक्र नहीं है.
दरअसल पुनर्जन्म न ब्यवहारिक है न वास्तविक है. पुनर्जन्म खुद में बदलाव लाना,जीवनशैली या पद्धति बदलना है, इसी जीवन के पुराने बुरे कर्मों से तौबा कर नये नेकी के कर्मों का अख्तियार करना है.
#ऊँट_का_सुई_के_छेद_से_निकलना.
भावार्थ कुछ और ही है. शाब्दिक अर्थों में यहाँ गड़बड़ होगी. उसी तरह पुनर्जन्म के शाब्दिक अर्थ लेकर चलें तो अनर्थ होगा. पुनर्जन्म तथ्य है सत्य नहीं.
श्रीकृष्ण ने पर्वत को उंगली पर उठाया यह तथ्य है सत्य नहीं. हनुमान जी हवा में उड़कर पर्वत को उठाकर लाया यह तथ्य है सत्य नहीं.
जैसे पुनर्जीवित,पुनर्विवाह,पुनर्विचार, पुनर्वास
ठीक वैसे ही #पुनर्जन्म नहीं है
कठोपनिषद १/१/१२ में भी ऐसा है.
- #स्वर्गे_लोक_न_भयं......मोदते स्वर्गलोके।।
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