क्या माँसाहारी हिंदू नहीं हैं..?

#क्या_मांसाहारी_हिंदू_नहीं???

मांसाहार विषय पर परस्पर विवाद कर हम आपस में सिर्फ विरोध उत्पन्न कर रहे हैं ! जब मनुष्य को कृषि का ज्ञान नहीं था तब मांसाहार उसकी प्राकृतिक विवशता थी ! उस समय निसर्गत:जो धर्म था वह एकमात्र सनातन धर्म ही था ! मनुस्मृति में श्राद्धकर्म में पितरों की तृप्ति हेतु जिन पशु,पक्षियों और मछलियों का मांस प्रशस्त कहा गया है वह अत्यंत स्पष्ट श्लोक हैं और कदापि प्रक्षिप्त नहीं हैं क्योंकि हिन्दुओं में अहिंसा का कांसेप्ट बौद्ध काल के पश्चात शामिल किया गया ! वह भी इसलिए कि बौद्ध मत में अहिंसा पर इतना जोर दिया गया कि उससे सारी हिन्दू मान्यताएं छिन्न भिन्न होने लगीं ! जिन लोगों ने मनुस्मृति का सूक्ष्मता से अध्ययन किया हो और मूल तथा प्रक्षिप्त श्लोकों में अंतर कर सकते हैं उन्हें बलि,श्राद्ध और आखेट के मांस के विषय में ज्ञान होना चाहिए ! वन में आखेट राजाओं,सामंतों का प्रिय खेल हुआ करता था और वह मांस उनकी पाकशालाओं में भोजन के निमित्त ही प्रयोग किया जाता था ! हिन्दू समाज का मांसाहार के प्रति घृणा का भाव रखना तो उचित है किन्तु यह भाव अब कायरता उत्पन्न कर रहा है ! मांसाहार यदि करना है तो यह हलाल के बजाय झटके का ही होना चाहिए ! यद्यपि व्यक्तिगत रूप से मैं मांसाहार का घोर विरोधी हूं ! मांसाहार को तो अब वैज्ञानिक शोध में भी हानिकारक पाया गया है ! मांसाहार का प्रत्येक मनुष्य को अनिवार्य रूप से पर्यावरण की रक्षा के लिए पूर्ण परित्याग कर देना चाहिए ।Published from Blogger Prime Android App

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