भारतीय ब्यापक सागर हैं तालाब नहीं..

हिंदुस्तान अपने विचारों के लिए सिरमौर था और आज भी है. उसके चिंतकों ने सिखाया था,चरैवेति चरैवेति क्योंकि ठहराव और मौत जुड़वा संतानें हैं. चिंतकों की विचारशाला में कई बड़े कद हुए. कर्णाद,पाणिनि, पतंजलि, चर्वाक,कौटिल्य, कबीर जैसे असाधारण चिंतक हुए बल्कि बाद में हमने कार्लमार्क्स, माओत्से, फ्रायड, नीत्शे, सावरकर, पेरियार, ओशो को भी सहिष्णुता से सुना है.

       बौद्धिक और आध्यात्मिक कद के ये शीर्ष पुरूष अंधेरे में महासागर में डूबते उतरते इंसानी जहाजों के लिए लाईट हाऊस हैं. विवेकानंद जी ने अद्भुत वाक्य कहा था कि हिंदुस्तान की चिंतन परंपरा में बहिष्कार या खारिज जैसा शब्द नहीं है. यह देश विचारों के हर लकीर के मुकाबले बड़ी लकीर खींचता है.

          अतीत के ज्ञान को भारतीय विचारकों ने कभी ठंडा, सड़ा या बासी नहीं कहा. उसे यादों और एहसासों के भंडार में रख लिया. वह पुस्तैनी परिचय हो गया. बुनियाद, दीवारें और भवन कायम रहे. पलस्तर तो झड़ता है फिर चढ़ भी जाता है. तुलसीदास को पढ़िये, वाल्मिकी को बांचिये, गीता को,वेद को या कुमार गंधर्व को सुन लीजिए. पूर्वाग्रह रखने की जरूरत नहीं. पिछले को मौजूदा में शामिल करके पुराने नए विचार को सुपाच्य और उपजाऊ बनाने की महारत की यही कला है. यह एक के बाद एक नहीं बल्कि एक में एक को समेटने का हुनर है. इसी का नाम नैरंतर्य है.

     भारतीयों के विचार अपने चमत्कारिक एहसास के कारण एक साथ शास्वत और प्रासंगिक होता चलता है. पश्चिम एक को खारिज कर दूसरे को मंजूर कर बढ़ते जाने की निरंतरता में जीता है. भारत का अनोखा योगदान हर इंसान को बेहतर बनने के अवसर और संभावनाएं छोड़ता आया है और सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच भी उपलब्ध कराता आया है.

     इस लिहाज से वेद,पुराण,उपनिषद और अन्यान्य शास्त्रों, दर्शनों,आदर्शों को जानना ही यहाँ धर्म समझा गया है. यहाँ लोग इन इतिहास पूर्व उल्लेखों को किसी गुफा या बावली में पाये गए रत्नों की तरह ढूंढते हैं. यह देश कभी भी सिकुड़ा,सूखता, पपड़ियाता विचार विश्व पाठशाला नहीं रहा है.

     यही वजह है कि आज देश में नए लहरो,आदर्शोंं का स्वागत हुआ है. ईसाईयत को हाथों हाथ लिया जा रहा है. लोग जीने का तरीका बदल रहे हैं. ईसा के आदर्शों पर भी लोग दिलचस्पी ले रहे हैं और ईसा के आदर्शों पर चलने का यत्न कर रहे हैं.इससे कुछ पूर्वाग्रहियों को अपना धर्म खतरे में लग रहा है.जीवन बदलने वालों पर धर्म बदलने का आक्षेप हो रहा, लालची, भीरु बताया जा रहा है.

    भारयीय कभी तर्कभीरू,लालची,साम दाम,दंड, भेद करनेवाले और न ही कायर रहे.साम दाम दण्ड भेद भारतीय नहीं जानते. विदेशियों के ये हथियार है.दो बोरी चावल नौकरी छोकरी की लालच में धर्मांतरण बताकर यही लोग भारतीयों को लालची बताने का प्रयास करते हैं. यहाँ हमेशा स्वविवेक के इस्तेमाल पर बल दिया गया. ऐसे में तमाम आक्षेप और आरोप आक्षेपकों का दुराग्रह और पूर्वाग्रह ही है. जिससे वे उबरना नहीं चाहते.

        कुछ लोग हिंदुस्तान को तालाब बनाने में तुले हैं जबकि व्यापक भारतीय विचारों का सागर हैं.......Published from Blogger Prime Android App


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