अंत समय में इंसान झूठ नहीं बोलता...
अंत में झूठ का पर्दाफ़ाश हो जाता है
स्वामी जी बताते हैं कि
अब स्वामी जी के इस सिद्धान्त के आधार पर स्वामी जी का अन्त देखते हैं। आप यह जान ही चुके हैं कि अन्तकाल में उनका हवन छूट चुका था। मृत्यु वाले दिन वह स्नान भी नहीं कर पाए थे। अब उनके बिल्कुल अन्तिम वाक्य देखिए। मृत्यु वाले दिन अर्थात 30 अक्तूबर 1883 ई. को शाम के 6 बजे स्वामी जी पलंग पर सीधे लेटे हुए थे। उन्होंने कहा-
स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश में धूर्त, ठग और धोखेबाज़ों को ‘पोप’ की संज्ञा देकर उनके बुरे कामों को ‘लीला’ कहा है। उन्होंने लीला का अर्थ बताते हुए कहा है-
स्वामी जी ईश्वर में इच्छा का होना नहीं मानते थे। वह कहते थे-
‘...ईश्वर में इच्छा का तो सम्भव नहीं.’ (सत्यार्थ प्रकाश,सप्तम.,134)
इसके बावजूद उन्होंने अपने अंतिम कथन में ईश्वर में इच्छा का होना भी माना है। इस तरह हम देखते हैं कि जिन बातों को वह ईश्वर की महिमा के प्रतिकूल मानते थे। अपने अंत के एक वाक्य में वह ईश्वर के लिए ऐसी दो बातें कह बैठे। अपनी मान्यताओं के अनुसार जीने में तो वह असफल रहे लेकिन मरते समय वह उन्हें स्पष्टतः नकारने में पूरी तरह सफल रहे। उन्होंने अपनी अंतिम भावनाओं को पूरी निर्भीकता से व्यक्त कर दिया। यह वास्तव में ही बड़े साहस का काम है।
(103) जिन मान्यताओं को स्वयं स्वामी जी ने ही नकार दिया है, आर्य समाजी भाई-बहनों द्वारा उन्हें ढोते रहने का क्या औचित्य है?
‘...चाहे कितनी भी चतुराई करे परन्तु अन्त में सच-सच और झूठ-झूठ हो जाता है।’ (सत्यार्थ प्रकाश,त्रयोदश.,पृ.349)
अब स्वामी जी के इस सिद्धान्त के आधार पर स्वामी जी का अन्त देखते हैं। आप यह जान ही चुके हैं कि अन्तकाल में उनका हवन छूट चुका था। मृत्यु वाले दिन वह स्नान भी नहीं कर पाए थे। अब उनके बिल्कुल अन्तिम वाक्य देखिए। मृत्यु वाले दिन अर्थात 30 अक्तूबर 1883 ई. को शाम के 6 बजे स्वामी जी पलंग पर सीधे लेटे हुए थे। उन्होंने कहा-‘हे दयामय, हे सर्वशक्तिमान् ईश्वर, तेरी यही इच्छा है, तेरी यही इच्छा है, तेरी इच्छा पूर्ण हो, अहा! तैने अच्छी लीला की।’ (महर्षि दयानन्द स. का जीवन चरित्र, पृ.830)स्वामी जी ने अपने साहित्य में कहीं भी ईश्वर और सत्पुरूड्ढों के कर्मों को लीला नहीं कहा है लेकिन अन्तकाल आया तो जाते जाते वह ईश्वर के कर्म को भी ‘लीला’ कह गए। इससे समझा जा सकता है कि दुनिया से विदा होते समय उनके दिल में ईश्वर के प्रति किस प्रकार के भाव थे।
स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश में धूर्त, ठग और धोखेबाज़ों को ‘पोप’ की संज्ञा देकर उनके बुरे कामों को ‘लीला’ कहा है। उन्होंने लीला का अर्थ बताते हुए कहा है-
‘अर्थात् राजा और प्रजा को विद्या न पढ़ने देना, अच्छे पुरूड्ढों का संग न होने देना, रात दिन बहकाने के सिवाय दूसरा कुछ भी काम नहीं करना है।’ (सत्यार्थप्रकाश, एकादश., पृ.191)क्या यह मानना सही है कि ईश्वर लीला करता है?
स्वामी जी ईश्वर में इच्छा का होना नहीं मानते थे। वह कहते थे-
‘...ईश्वर में इच्छा का तो सम्भव नहीं.’ (सत्यार्थ प्रकाश,सप्तम.,134)
इसके बावजूद उन्होंने अपने अंतिम कथन में ईश्वर में इच्छा का होना भी माना है। इस तरह हम देखते हैं कि जिन बातों को वह ईश्वर की महिमा के प्रतिकूल मानते थे। अपने अंत के एक वाक्य में वह ईश्वर के लिए ऐसी दो बातें कह बैठे। अपनी मान्यताओं के अनुसार जीने में तो वह असफल रहे लेकिन मरते समय वह उन्हें स्पष्टतः नकारने में पूरी तरह सफल रहे। उन्होंने अपनी अंतिम भावनाओं को पूरी निर्भीकता से व्यक्त कर दिया। यह वास्तव में ही बड़े साहस का काम है।
(103) जिन मान्यताओं को स्वयं स्वामी जी ने ही नकार दिया है, आर्य समाजी भाई-बहनों द्वारा उन्हें ढोते रहने का क्या औचित्य है?
अनवर जमाल जी.।

Comments
Post a Comment