वैदिक अवधारणा यहाँ ध्वस्त होता है...

स्वामी दयानंद ने लिखा है कि वेदों का अवतरण ऋषियों की मातृभाषा में न होकर संस्कृत भाषा में हुआ। संस्कृत भाषा उस समय किसी देश अथवा जाति की भाषा नहीं थी। 

कारण यह लिखा है कि अगर ईश्वर किसी देश अथवा जाती की भाषा में वेदों का अवतरण करता तो ईश्वर पक्षपाती होता, क्योंकि जिस देश की भाषा में वेदों का अवतरण होता उसको पढ़ने और पढ़ाने में सुगमता और अन्यों को कठिनता होती। (7-89) (7-92)


  जैसा कि मूल शंकर जी ने लिखा है कि वेद आदि ग्रंथ हैं। सृष्टि के आदि में परमात्मा ने मनुष्यों को उत्पन्न करके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा आदि चारों महर्षियों को चारों वेदों को ग्रहण कराया। (7-87) यहां सवाल यह पैदा होता है कि वेदों से पहले चारों ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा आदि की मूलभाषा कौन सी थी? 


दूसरा सवाल यह कि सृष्टि के आदि में पृथ्वी पर कितने देश और क़ौमे थी और उनमें कितनी भाषाएं बोली जाती थी?

 तीसरा सवाल यह कि वेदों के समय पृथ्वी पर विदेशी अगर थे और वे न ऋषियों की भाषा जानते थे और न ही संस्कृत जानते थे और न ही ऋषि विदेशियों की भाषा जानते थे तो ऋषियों ने उन्हें वेदों का ज्ञान किस प्रकार कराया?


अब जहां तक पक्षपात का सवाल है तो क्या ईश्वर ने सभी मनुष्यों को सभी सुख-सुविधाएं, स्वास्थ्य, ज्ञान, आयु आदि समान रूप से प्रदान की है? स्वामी जी का यह कहना कि अगर किसी देश भाषा में वेदों का प्रकाश होता तो ईश्वर पक्षपाती होता, अर्थपूर्ण, युक्ति-युक्त और स्वाभाविक नहीं है। स्वामी जी की उक्त धारणा विवेक पर

आधारित न होकर मात्र कल्पना पर आधारित है। आज विश्व में सभी बड़ी क़ौमों के पास अपनी-अपनी ईश्वरीय पुस्तकें हैं, जैसे तलमूद, तौरेत, जबूर, बाइबिल, कुरआन आदि। सभी पुस्तकों का अवतरण उसी भाषा में हुआ जो संदेशवाहक की मातृभाषा थी। वेद अगर सृष्टि की आदि पुस्तक है तो फिर यह भी सत्य है कि उस समय पृथ्वी पर चंद ही मनुष्य होंगे। सृष्टि के आदि में देश-विदेश और पक्षपात की बात करना ही बेवकूफ़ी होगी।

वैदिक अवधारणा यहीं ध्वस्त होती है. सबसे प्राचीन भाषा तमिल है.Published from Blogger Prime Android App

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