सत्य बोलने के लिए तैयारी नहीं करनी होती..

सत्य का अनुसरण करो और वर्तमान क्षण में जियो, अस्तित्व सत्य है.
    "सत्यवान बनो" इस वाक्यांश का अर्थ केवल सत्य बोलना नहीं है, बल्कि अपने समग्र जीवन से सत्य को व्यक्त करना है.
     यदि कोई नेत्रहीन है और आप उससे कहें"तुम अंधे आदमी हो"तो आप सत्य तो बोल रहे हैं मगर सुनने वाला चोटिल महसूस कर रहा है.
        सच बोलें और हमेशा सत्य बोलें लेकिन सुखकर सत्य बोलें.
यदि मरीज कुछ ज्यादा ही बीमार है तो वैद्य भले के लिए झूठ भी कहे तो यह पाप नहीं है. यदि वैद्य कहे "अब तुम्हारी बीमारी बढ़ गई है मुश्किल है कि तुम बच पाओगे"
    ऐसे में दो चार दिन और जीने वाला इसी क्षण मर जायेगा.
व्यक्ति किताबी ज्ञान या स्थूल ज्ञान को ही आधार मानकर व्यवहार करने लगता है. इसमें बड़ी भूल है. यही आध्यात्म विकास में बड़ी विफलता का कारण है.इसमें पड़कर व्यक्ति तर्क के बजाय कुतर्क ज्यादा करता है.
       हरेक कली चटकने और विकसित पुष्प बनने में समय लेती है. कली को फूल बनने पर जोर मत डालें. उचित समय की प्रतीक्षा करें.. अपने भीतर के संपूर्ण पुष्प के लिए.
     ईश्वरीय ज्ञान को ही वेद कहा गया है लेकिन लोग छंद और व्याकरण में बद्ध श्लोक और मंत्रों को ही,बाईबल और कुरान की लिखित आयतों, कलामों को ही ईश्वरीय वाणी और ज्ञान समझते आये हैं.
     यही भूल लोगों के बीच मतभेद और दरार लाती है.
हम वेद कुरान और बाईबल के लिए झगड़ा करते आये हैं.
      इन तीनों ही धार्मिक किताबों में मतभेद कम और समानताएं ज्यादा हैं. हमें मतभेदों को छोड़ समानताओं पर बात करनी चाहिए क्योंकि मतभेद वैमनस्य लाती है और मतभेद खत्म होगी इसकी गुंजाइश कम है.
     #वेद(ईश्वरीय ज्ञान)हम नित पाते हैं.वेद चहुँ ओर बिखरी पड़ी है बस संजोने और बटोरने की जरूरत है.अंधे,बहरे और लंगड़े ही वेद बटोर नहीं पाते. वेद नित नहीं पाते.
      लिखित और रटित वेद (बाईबल, कुरआन )अंधों की लाठी भर है.जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य हैं जो स्वयं ही जाने जाते हैं.Published from Blogger Prime Android App

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