दयानंद समाज सुधारक या समाज नाशक!?

 दयापंथी बाईबल में भी नियोग खोदकर #नियोग को पुण्य कर्म साबित करने की कोशिश में हैं.बाइबिल में बड़ा लंबा कानून है  पति धर्म निभाना पड़ता है.

         नियोग नियोगियों के लिए बड़ी सुविधाएं मुहैया कराती है कि उस में पति धर्म निभाना ही नहीं पड़ता ....

        #नियोगी मौज लेते रहें जब गर्भ ठहरे निकल लें...!!

     ऐसा तो बाईबल में कतई नहीं है.

जिनके महर्षि और स्वामी ने ऋषियों को देवर की भूमिका निभाने वाले बताते हैं वो भला ऐय्याशी मानसिकता कहाँ छुपा पायेंगे.

          नियोग वह कार्य है जहाँ पुण्य का पुण्य, मज़े का मज़ा!!!

न भोग्या स्त्री की कोई Responsibility न होने वाले बच्चे की.विध्वा जिसके पति की चिता अभी बुझी भी नहीं है और उसे नियोग के लिए उठाया जाता है हे विध्वे उठ!!रोना धोना बंद कर नियोग कर....!!!

घोर आश्चर्य!

आर्य (अ)सभ्यता सच मुच बड़ी सुविधा जनक है |

मगर #दयापंथियों को शर्म नहीं आती बेशर्मी से सेरोगेसी को नियोग का नया संस्करण बताते हैं. और यह तथ्य छुपाते हैं कि नियोग मे देशी घी का इस्तेमाल होता है. समाज में डंके बजाकर भौजाई के कुण्डी आधी रात को खड़काई जाती है. जबकि सेरोगेसी में ऐसी पशुतुल्य हरकतें नहीं होतीं.

वैदिक नियोग की तरह नियोगी बाप गर्भिणी करके बरी नहीं हो जाता.

#जब_जब_हो_तब_तब_कन्या_ही_होवे...

#पुत्र_ना_हों_तो_स्त्री_को_छोड़कर दूसरी स्त्री से #नियोग करके संतानोत्पत्ति कर लेवें●●#सत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समुल्लास।।

【स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो】यह व्याविचार नियोग को जस्टिफाई करने के लिए है.

      सवाल:

१)पुत्री से ही संतोष क्यों नहीं. पुत्र ही क्यों???

२)दूसरी स्त्री से पुत्र ही होगा इसकी क्या गारंटी है??

३)कन्या ही होने के लिए जिम्मेदार स्त्री है या पुरुष??Published from Blogger Prime Android App

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