आर्य समाज का जनक वह चूहा..
#आर्य_समाज_का_जनक_है_वह_चूहा:
जिसको लड्डू खाते देखकर महर्षि दयानंद सरस्वती के मन मे यह भाव आया कि जो भगवान अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह मेरी क्या रक्षा करेगा? दयानंद जिद्दी किस्म के व्यक्ति थे। बचपन से ही जिद्दी थे। बाद में भी रहे।
शिवरात्रि की पूजा थी। पिता बड़े भक्त थे। बेटे को भी पूजा में बिठाया। रात्रि भर का जागरण था। दयानंद रात भर बैठे रहे। पिता सो गए। वह जागते रहे। और जो हुवा उसने उनकी जिंदगी बदल दी। हुवा यह कि एक चूहा शिवलिंग पर चढ़ाए गए लड्डू खाने लगा। यही नहीं वह तो शिवलिंग पर चढ़ गया। शिवजी पर बैठकर मस्ती से इधर उधर देखने नाचने लगा।
बस दयानंद के मन से सारी श्रद्धा चली गयी। कि ये क्या शिव जी चूहे को भी नही भगा सकते। जो एक चूहे को नही भगा सकता वह हमारी क्या रक्षा करेगा। यदि तीक्ष्ण बुद्द्धि व्यक्ति हो तो यही होगा।
यदि दयानंद को पहले भीतर जाना सिखाया गया होता, बाहर की पूजा न सिखाया गया होता तो यह नहीं होता।
आर्य समाज ने जो उपद्रव खड़ा किया वह न होता। बच्चों को पहले ध्यान में ले जाना चाहिए। बच्चे बूढों से अधिक आसानी से ध्यान में उतर जाते हैं. बालमन है यदि दयानंद को ध्यान आता, प्रयास किया होता तो हो सकता घटना यही घटती लेकिन परिणाम अलग होते।

--- ओशो---
गूंगे का गुड
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