ईसाइयों के चमत्कार पाखंड हैं. क्या चमत्कार हुआ आदिवासियों दलितों के लिए कि ईसाई बन गए.


 #ईसाईयत_कमजोर_है_तार्किक_नहीं_है। इसीलिए ईसाई नास्तिक बन रहे हैं चर्च निलाम हो रहे हैं...

                   मेरे भाई इसीलिए कमजोर तबके का इशाईयत में जाना सबसे अच्छा है।क्योंकि इशाइयों में सर्वाधिक नास्तिकता की सुविधा है।ईसाइयत से लचीला पंथ और कोई नहीं है.कमजोरों दलितों,पिछडों आदिवासियों को सदियों से मुख्यधारा से अलग शिक्षा संस्कारों से बंचित उपेक्षित समझा गया ऐसे ही लोगों को इशाईयत समाज के मुख्यधारा में ला रही है।उनके शैक्षणिक सामाजिक आर्थिक विकास का समुचित व्यवस्था कर रही है।जब लोग शिक्षित हो जाएंगे तो स्वयं निर्णय ले लेंगे।

इशाईयत के तर्कनिष्ठ लोगों ने इशाईयत के कमियों को खारिज कर वैज्ञानिक उन्नति का साहस भी किया है।

आप में नास्तिक होने की प्रवृत्ति भी नहीं है।

इशाईयत तरलता बदलाव बगावत में विश्वास करती है।

      ईसाईयत परिवर्तनों और नई कोपलों का भब्य स्वागत करता है।आप समाज को कट्टरपंथी बना रहे हैं।

       #चंगाई_और_चमत्कार_के_नाम_पर_ईसाईयत_फैला_रहे_हो चमत्कार नहीं होता तुमलोग गरीबों दलितों के लिए कौन सा चमत्कार करते हो??

उनके जीवन में सबसे बड़ा चमत्कार तो यह हुआ कि ये शिक्षित हो सके।नौकरी कर सके।गरीबों के लिए तो उन्हें अच्छी रोजी रोटी मिल जाना ही चमत्कार है।

इशाईयत मिशनरी वैसे गरीब के गंदी बस्ती के मैले कुचैले अधनंगे बच्चे को गोद में उठाकर उसके धूल झाड़कर नए कपड़े पहनाकर अच्छे स्कूलों के हास्टल में रख देती है।वह लड़का लड़की चमत्कार अनुभव करता है जब साफ सुथरा बिछावन सुंदर भोजन मिलता है।बाद में वह एसपी कलेक्टर डाक्टर इंजीनियर प्रोफेसर बनते हैं।

उन गाँवो से गुजरने में आप नाक बंद कर लेते हैं।भौहें सिकोड लेते हो।वे अगर पैर छूना चाहते हैं तो आप भाग खड़े होते हैं।उन्हें मनुष्य समझते ही नहीं।और ना ही उन्हें मनुष्य बनने देना चाहते हैं।

इशाईयत उनके लिए चौतरफा चमत्कार है।

          चंगाई कोइ नया चीज नहीं है।देहातों में यह झाड़फूंक के रूप में हजारों वर्षों से प्रचलित है।

यह साइकिक ट्रिटमेंट है।और इसके लाभ भी होते हैं।इसलिए आदिवासी,दलित, पिछड़े समाज में पैठ बनाने के लिए मिशनरी को उन्हीं की तरह होना पड़ता है।

कोइ बहुत बड़ा विद्वान शिक्षक भी अगर बच्चे को पढ़ाते हैं तो उन्हें बच्चे के स्तर पर आना होता है।

     बच्चा शिक्षित होकर स्वविवेक का इस्तेमाल कर सकता है।ईसाईयत के गुण गा सकता या नास्तिक बन सकता है वह स्वतंत्र है।ईसाईयत का काम है दमित,शोषित, पिछड़े असहाय, निसहाय, रोगी निर्बल और जरुरतमंदों अनाथों को सबल बनाये और ईसाईयत बखूबी अपना धर्म निभा रहा है.

               जितने साधू संत पुजारी पंडित मठ आश्रम हैं,आपके बड़े धार्मिक संगठन हैं.वे अगर गरीब गंदी बस्तियों में जाकर कपड़े राशन बाँटते,उनकी जरुरतों को जानते,सेवाएं देते.वहां स्कूल खोलकर सबको पढ़ाने,जागरूक बनाने उनके जीवनशैली सुधारने में नशामुक्ति के लिए प्रयास करते तो इशाईयत की जरुरत ही नहीं रहती.

    लेकिन नहीं... जब ईसाई वहाँ पहुँचकर जहाँ आप जाना भी पसंद नहीं करते अपना धर्म निभायें गरीबों अनपढ़ों के लिए काम करें तो आपको पीड़ा होती है. आपके धर्म खतरे में आ जाते हैं!!

    हद है.https://youtu.be/ssHcWJtVl6w


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