गाँधीजी और स्त्रियाँ..
गांधी और स्त्रियां
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इस पोस्ट के साथ एक तसवीर लगी है. सोशल मीडिया पर यह तसवीर अक्सर दिख जाती है. अमूमन इस तसवीर के साथ लिखा रहता है, अय्याश गांधी. न भी हो तो पोस्ट करने वालों के भाव यही रहते हैं. वैसे पहली नजर में यह लग जाता है कि यह तसवीर गांधी की नहीं है. क्योंकि न तो गांधी इस तरह धोती पहनते थे, न उनकी मांसपेशियां इतनी उभरी हुई थीं. फिर भी, अगर यह तसवीर गांधी की ही होती, तो इसमें बुरा लगने या संकोच करने की बात नहीं थी. यह बहुत सहज और सुंदर तसवीर है, आपको भी लगेगी अगर आपके मन में महिला, प्रेम और सैक्स को लेकर कुंठा न हो.
मैं गांधी जी के जीवन के आखिरी वर्ष के बारे में सिलसिलेवार तरीके से पढ़ता रहा हूं. गांधी वांग्मय में उनके रोज की गतिविधियों का ब्योरा है. फिर उनके सचिव प्यारेलाल नैयर, उनकी पोती मनुबेन गांधी और नोआखली में उनके दुभाषिया रहे निर्मल बोस की किताबें हैं. इन तमाम किताबों में उनके पल-पल का ब्योरा है. नोआखली से लेकर दिल्ली में उनकी हत्या तक कई महिलाएं उनके साथ और आसपास रहीं. इनमें मनु बेन गांधी, डॉ सुशीला नैयर, आभा गांधी, सुचेता कृपलानी, सुशील पै, अम्तुस सलाम आदि थीं. ये सब महिलाएं उनकी मदद के लिए, सांप्रदायिकता के खिलाफ उनके अभियान में उनका साथ निभाने के लिए गयी थीं. इसके अलावा राजकुमारी अमृत कौर और सरोजिनी नायडु उन्हें नियमित पत्र लिखा करती थीं. कस्तूरबा पहले गुजर चुकी थीं. गांधी अकेले हो गये थे और उस अकेलेपन में इन तमाम औरतों की उनके जीवन में बड़ी सहज मौजूदगी थी. 

मनु बेन 1946 के आखिर में नोआखली आयीं और उनकी हत्या के दिन तक उनके साथ रहीं. वह उनके भतीजे की बेटी थीं. उसी तरह आभा गांधी जो मूलतः बंगाल की ही थीं. उनके बंगाल पहुंचने पर उनके साथ हुईं और उनके श्रीरामपुर प्रवास के वक्त उनसे अलग हुईं फिर दिल्ली में साथ हो गयीं. आभा उनके भतीजे कनु गांधी की पत्नी थीं. गांधी जो उस वक्त तक 78-79 साल के हो चुके थे, इन दोनों नवयुवतियों को अपनी छड़ी कहा करते थे. सुशीला नैयर उनकी चिकित्सक थीं, पहले उनके साथ रह चुकी थीं और उनकी डायरी भी लिखती रहती थीं.
अम्तुस सलाम पटियाला की थीं और गांधी की ऐसी फोलोअर थीं कि उनकी वजह से बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान नहीं गयीं भले उनका पूरा परिवार वहां चला गया. बाद में वे बंटवारे के वक्त दंगों की शिकार महिलाओं की मदद करने लगीं. सुचेता कृपलानी और सुशीला पै उनके बहुत करीब नहीं थीं, मगर राजनीतिक रूप से उनकी अनुयायी थीं.
मनु बेन के साथ ब्रह्मचर्य के प्रयोग के उनके किस्से बहुत प्रचलित हुए. दिलचस्प है कि ये प्रचलित भी इसलिए हुए क्योंकि इनके बारे में गांधी ने खुद नोआखली की एक प्रार्थना सभा में लोगों को बताया. वरना शायद यह लोगों को पता भी नहीं चलता. उनके दो सहयोगी एक स्टेनोग्राफर परशुराम और दूसरे दुभाषिया निर्मल कुमार बोस ने इस मसले पर उनका साथ छोड़ दिया. वे उनके साथ रहते थे इसलिए उन्हें मालूम था. मगर दोनों ने उस वक्त इस मुद्दे को सार्वजनिक नहीं किया. दोनों का विरोध सिर्फ इतना था कि ऐसे वक्त में जब गांधी इतना बड़ा काम कर रहे हैं, उन्हें इस प्रयोग में नहीं उलझना चाहिए. ऐसा उनके अनन्य सहयोगी ठक्कर बापा ने भी कहा. हालांकि बहस के बाद उन्होंने ठक्कर बापा की बात यह कहते हुए मान ली कि फिलहाल यह नहीं करेंगे. मगर दिल्ली में उनका यह प्रयोग फिर शुरू हो गया.
गांधी से मेरी अहसमति इस बात को लेकर है कि वे ब्रह्मचर्य के सिद्धांत पर बहुत भरोसा करते थे और मानते थे कि एक ब्रह्मचारी इंसान में आंतरिक शक्ति होती है. वह भरोसा कुछ अधिक था. नोआखली में जब उन्होंने सांप्रदायिक मसलों पर काम करना शुरू किया तो शुरुआत में उन्हें सफलता नहीं मिली. शुरुआती असफलता में उन्होंने यह माना कि संभवतः यह इसलिए है, कि वे ठीक से ब्रह्मचारी नहीं हुए हैं. कुछ महीने पहले सोते वक्त उन्हें वीर्यपात हो गया था, यह बात उन्हें कचोटती थी. इसलिए वे खुद को ब्रह्मचर्य की उस सीमा पर ले जाना चाहते थे, जहां उन्हें किसी नंगी औरत के साथ सोते हुए भी यौन की इच्छा न हो.
इस सनक की वजह से उन्होंने ब्रह्मचर्य का प्रयोग किया. वह भी अपनी पोती मनुबेन गांधी के साथ. वह पोती जिसे कस्तूरबा ने अपनी बेटी माना था और बाद में गांधी ने कहा कि कस्तूरबा के बाद मनु गांधी उनकी बेटी है. मनु गांधी ने भी गांधी को अपनी मां माना और एक किताब लिखा भी है, गांधी मेरी मां. पतली सी किताब है. हालांकि मनुबेन गांधी ने न अपनी डायरी में और न ही उस किताब में कहीं यह जिक्र किया कि गांधी ने उनके साथ ऐसे प्रयोग किये हैं. मगर गांधी ने नोआखली में सार्वजनिक प्रार्थना सभा में इस बात का जिक्र किया कि वे ऐसा प्रयोग कर रहे हैं. यह हमें समझाती है कि गांधी कितने पारदर्शी थे.
गांधी ने मनुबेन के साथ यह प्रयोग क्यों किया. क्योंकि मनुबेन कहती थी कि उनमें सैक्स को लेकर कोई फीलिंग नहीं है. गांधी लिखते हैं कि एक मां के तौर पर अपनी बेटी के इस मसले को समझना उनकी जिम्मेदारी थी. गांधी के सचिव प्यारेलाल नैयर मनुबेन गांधी को पसंद करते थे और उनके शादी करना चाहते थे.
मगर मनुबेन शायद बहुत इच्छुक नहीं थीं. इसलिए गांधी ने प्यारेलाल को फिलहाल रुकने कहा था. वे एक मां के तौर पर मनुबेन के सैक्स और वैवाहिक जीवन के मसले में गंभीर थे. इसलिए वे लिखते हैं कि इस परीक्षण के जरिये वे मनु को भी समझना चाहते थे. गांधी की एक और आदत थी जो अमूमन लोगों को पसंद न आये. वे अपने आसपास के लोगों को किसी प्रयोग में झोंक देते थे. उन्होंने अपनी पुत्री जैसी मनुबेन को भी इस प्रयोग में झोंक दिया.
गांधी ने मनु के साथ सैक्स नहीं किया. उन्होंने मनु के साथ सैक्स न करने का प्रयोग किया. वे ब्रह्मचर्य की भावना को मानते थे, मगर इसके लिए वे स्त्रियों से दूर रहने के उपाय को सही नहीं मानते. वे कहते थे कि असली ब्रह्मचर्य वह है जब स्त्री आपके आसपास हो और आपका मन सैक्स की तरफ न जाये. जैसे दिगंबर जैन मुनियों के साथ होता है. मनुबेन राजी खुशी इस प्रयोग में साथ हुईं. और आखिर तक गांधी के साथ रहीं. पूरे समर्पण के साथ.
वे ही नहीं कई और महिलाएं थीं जो गांधी के काफी नजदीक थीं. कई महिलाएं उनकी मालिश किया करती थीं. इसमें सुशीला नैयर का भी नाम आता है. गांधी ठंड के दिनों में दिन के वक्त खुले में मालिश कराया करते थे. तब वे अर्ध नग्न होते थे. महिलाएं उसी वक्त उनकी मालिश करती थीं. मगर इसमें न यौन था और न ही ब्रह्मचर्य. यह सिर्फ मालिश थी. जो कोई भी व्यक्ति किसी का कर सकता है. महिलाएं उसी भाव से गांधी की मालिश करती थीं, जिस भाव से महिलाएं अपने घर के बुजुर्गों का करती हैं. यह खुले में होता था और अक्सर उनकी मालिश के वक्त कई लोग उनसे मिलने और बतियाने आ जाते थे.
एक महिला का नाम भूल रहा हूं. गांधी उन्हें अपनी आध्यात्मिक पत्नी कहा करते थे. वे कहते थे कि आत्मिक रूप से वे उनके करीब हैं. वे भी इस रिश्ते में सहज थीं. राजकुमारी अमृत कौर समेत कई महिलाएं उनसे अपने पारिवारिक जीवन के मसले पर चर्चा करती थीं. उनके पत्र नियमित आते थे. अम्तुस सलाम भी खुद को गांधी की बेटी कहती थीं. महिलाएं उन्हें घेरे रहती थीं. और वे उनके साथ बहुत सहज रहती थीं. गांधी भी महिलाओं के बीच अधिक सहज रहते थे.
आखिरी दिनों में वे महसूस करते थे कि उनका मन स्त्री जैसा हो गया है. मनु बेन गांधी की मां के रूप में खुद को ढालना इसी का उदाहरण था. पता नहीं गांधी की करीबी महिलाओं और महिलाओं से उनके संपर्क को लेकर काम हुआ है या नहीं. मगर यह अद्भुत विषय है. हमें जानना समझना चाहिए.
यह समझना चाहिए कि इतनी महिलाएं उनके क्यों सहज थीं. न उस आदमी में रूप का आकर्षण था, न यौन का आकर्षण रहा होगा, वह भी 78-79 साल की उम्र में. न वे किसी को फेवर देते थे. फिर भी महिलाएं उनके आसपास पसंद करती थीं. मनुबेन गांधी इसी शर्त पर नोआखली आयी थीं कि वे गांधी के साथ रहेंगी. ब्रह्मचर्य को लेकर उनकी सनक जरूर अजीब थी. मगर ये सभी महिलाएं अपनी इच्छा से उनके साथ, उनके आसपास रहती थीं. उनके पास प्रेम, सुरक्षा और सहजता महसूस करती थीं. इस बात को समझने के लिए जरा अपने आसपास के महिलाओं से हमें पूछना चाहिए कि वे कितने पुरुषों के साथ सहजता महसूस करती हैं.
कितने लोकनेता ऐसे हैं, जिनके आसपास महिलाएं इतनी सहज रहती हैं. मैं सभी दलों की बात करता हूं. भाजपा से लेकर वाम दल तक. हर दल में महिलाएं असहज हैं. हर दल के पुरुष महिलाओं के जीवन को कठिन बनाते हैं. महिलाएं आंख और स्पर्श तक देखकर समझती हैं कि सामने वाला क्या सोच रहा है.
ऐसे में 75 साल पहले एक बुड्ढे के साथ अगर इतनी महिलाएं घर परिवार छोड़कर घूम रही थीं. उन्हें अपनें कंधों पर हाथ रखकर चलने दे रही थीं. उनकी मालिश कर रही थीं. उनके साथ नंगे सो रही थीं, वह भी सहजता से अपनी इच्छा से. तो यह अद्भुत बात है. गांधी सचमुच महापुरुष थे. बाकी राजनीतिक वजहों से आप भले उनका चरित्र बिगाड़ते रहिये. मगर दिल में एक बार जरूर सोचिये, आपके नजदीक क्या कोई एक भी ऐसी स्त्री है, जो आपके साथ इतनी सहज है? अगर हां, तो यह आपके लिए खुशी की बात है. अगर नहीं तो आपको अपने बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.
By Pushya Mitra
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